श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
बाहूंश्च मन्दरगिरे: परिवर्तनेन
निर्णिक्तबाहुवलयानधिलोकपालान् ।
सञ्चिन्तयेद्दशशतारमसह्यतेज:
शङ्खं च तत्करसरोरुहराजहंसम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
बाहून्—भुजाओं का; च—तथा; मन्दर-गिरे:—मन्दर पर्वत का; परिवर्तनेन—घूमने से; निर्णिक्त—पालिश किया, रगड़ खाया; बाहु-वलयान्—बाहु के आभूषण; अधिलोक-पालान्—ब्रह्माण्ड के नियामकों का स्रोत; सञ्चिन्तयेत्— ध्यान करे; दश-शत-अरम्—दस सौ आरे, सुदर्शन चक्र; असह्य-तेज:—चकाचौंध, द्युति; शङ्खम्—शंख; च—भी; तत्-कर—भगवान् के हाथ में; सरोरुह—कमल जैसे; राज-हंसम्—हंस की तरह ।.
 
अनुवाद
 
 इसके बाद योगी को भगवान् की चारों भुजाओं का ध्यान करना चाहिए जो प्रकृति के विभिन्न कार्यों का नियन्त्रण करने वाले देवताओं की समस्त शक्तियों के स्रोत हैं। फिर योगी चमचमाते उन आभूषणों पर मन केन्द्रित करे जो मन्दराचल के घूमने से रगड़ गये थे। उसे चाहिए कि भगवान् के चक्र (सुदर्शन चक्र) का भी ठीक से चिन्तन करे जो एक हजार आरों से तथा असह्य तेज से युक्त है। साथ ही वह शंख का ध्यान करे जो उनकी कमल-सदृश हथेली में हंस सा प्रतीत होता है।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बाहुओं से ही विधि तथा व्यवस्था के सारे विभाग उद्भूत होते हैं। ब्रह्माण्ड की विधि-व्यवस्था विभिन्न देवताओं के हाथ में है और यहाँ पर कहा गया है कि यह भगवान् के बाहुओं से उत्पन्न होती है। यहाँ पर मन्दराचल का उल्लेख हुआ है, क्योंकि जब समुद्र-मंथन हुआ तो एक ओर असुर थे और दूसरी ओर देवता थे, मन्दराचल को उन्होंने मथानी बना लिया था। भगवान् अपने कच्छपावतार में इस मथानी के लिए धुरी बने। फलस्वरूप मन्दराचल के घूमने से उनके आभूषण चमक गये (पालिशदार हो गये)। दूसरे शब्दों में, भगवान् की बाहुओं के आभूषणों की चमक ऐसी थी मानो हाल ही में उनकी पालिश की गई हो। भगवान् के हाथ का चक्र सुदर्शन चक्र कहलाता है और इसमें एक हजार आरे (तीलियाँ) है। योगियों को सलाह दी जाती है कि वे प्रत्येक आरे का ध्यान करें। उन्हें भगवान् के दिव्य रूप के प्रत्येक संघटक का ध्यान करना चाहिए।
 
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