श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत
दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।
मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां
चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
कौमोदकीम्—कौमोदकी नामक गदा; भगवत:—भगवान् की; दयिताम्—अत्यन्त प्रिय; स्मरेत—स्मरण करे; दिग्धाम्—सनी हुई; अराति—शत्रुओं के; भट—सैनिक; शोणित-कर्दमेन—रक्त के धब्बों से; मालाम्—माला, हार; मधुव्रत—भौंरों का; वरूथ—झुंड़; गिरा—ध्वनि से; उपघुष्टाम्—घिरा; चैत्यस्य—जीव का; तत्त्वम्—सिद्धान्त तत्त्व; अमलम्—शुद्ध; मणिम्—मोती की माला; अस्य—भगवान् के; कण्ठे—गले में ।.
 
अनुवाद
 
 फिर योगी को चाहिए कि वह प्रभु की कौमोदकी नामक गदा का ध्यान करे जो उन्हें अत्यन्त प्रिय है। यह गदा शत्रुतापूर्ण सैनिक असुरों को चूर-चूर करने वाली है और उनके रक्त से सनी हुई है। योगी को भगवान् के गले में पड़ी हुई सुन्दर माला का भी ध्यान करना चाहिए जिस पर मधुर गुंजार करते हुए भौंरे मँडराते रहते हैं। भगवान् की मोती की माला का भी ध्यान करना चाहिए जो उन शुद्ध आत्माओं की सूचक है, जो भगवान् की सेवा में लगे रहते हैं।
 
तात्पर्य
 योगी को भगवान् के दिव्य शरीर के विभिन्न अंगों का चिन्तन करना चाहिए। यहाँ बताया गया है कि जीवों की स्वाभाविक स्थिति समझनी होगी। यहाँ पर दो प्रकार की जीवात्माओं का उल्लेख है। पहले प्रकार की अराति कहलाती है। ये भगवान् की लीलाओं के प्रति विपरीत भाव रखती हैं। ऐसी जीवात्माओं को दण्डित करने के लिए भगवान् हाथ में अपनी भयानक गदा लिए प्रकट होते हैं जो सदैव असुरों के वध के रक्त से सनी रहती है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, जीवों की सभी योनियाँ भगवान् की सन्तानें हैं। फिर भी जीवों की दो श्रेणियाँ ऐसी हैं, जो दो भिन्न प्रकार से कार्य करती हैं। परमेश्वर शुद्ध जीवात्माओं को अपने गले में वैसे ही धारण करते हैं जिस प्रकार कोई अपने गले तथा वक्षस्थल पर पड़ी मोतियों की माला की रक्षा करता है। जो जीवात्माएँ शुद्ध कृष्णचेतना में रहती हैं उनको प्रतीकात्मक रूप से उनके गले की मोतियाँ कहा गया है। जो असुर हैं और परमेश्वर की लीलाओं के प्रति शत्रुता रखते हैं उन्हें वे अपनी गदा से दण्ड देते हैं, जो सदैव ऐसी पतित जीवात्माओं के रक्त से सनी रहती है। यह गदा भगवान् को प्रिय है, क्योंकि वे इसे आसुरी शरीरों को चूर-चूर करके रक्त के साथ मिलाने के लिए प्रयुक्त करते हैं। जिस प्रकार मिट्टी को पानी के साथ सानने से कीचड़ बन जाता है उसी प्रकार सांसारिक शत्रुओं या नास्तिकों को प्रभु अपनी गदा से ध्वस्त करते हैं जिससे उनकी गदा ऐसे असुरों के रक्त से गँदली हो जाती है।
 
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