श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
ग्राम्यधर्मनिवृत्तिश्च मोक्षधर्मरतिस्तथा ।
मितमेध्यादनं शश्वद्विविक्तक्षेमसेवनम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
ग्राम्य—परम्परागत; धर्म—धार्मिक प्रथा; निवृत्ति:—समाप्ति; च—तथा; मोक्ष—मोक्ष के लिए; धर्म—धार्मिक प्रथा; रति:—अनुरक्ति; तथा—उसी तरह; मित—कुछ; मेध्य—शुद्ध; अदनम्—भोजन करना; शश्वत्—सदैव; विविक्त— एकान्त; क्षेम—शान्तिपूर्ण; सेवनम्—घर ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को चाहिए कि परम्परागत धार्मिक प्रथाओं का परित्याग कर दे और उन प्रथाओं में अनुरक्त हो जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाली हैं। उसे स्वल्प भोजन करना चाहिए और सदैव एकान्तवास करना चाहिए जिससे उसे जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त हो सके।
 
तात्पर्य
 यहाँ संस्तुति की गई है कि आर्थिक विकास अथवा ऐन्द्रिक इच्छाओं की तुष्टि के लिए धार्मिक कार्यों से बचना चाहिए। प्रकृति के चंगुल से मुक्ति पाने के लिए ही धार्मिक कार्यों को कार्यान्वित किया जाय। श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में ही कहा गया है कि सर्वश्रेष्ठ धार्मिक प्रथा वह है, जिससे अकारण ही भगवान् की दिव्य भक्ति प्राप्त की जा सके। ऐसी धार्मिक प्रथा अबाध रूप से चलती है और इसके पालन से मनुष्य सचमुच संतुष्ट हो जाता है। यहाँ पर इसकी संस्तुति मोक्ष-धर्म के रूप में की गई है, जिसका अर्थ है मोक्ष के लिए या भौतिक कल्मष से छूटने के लिए धार्मिक अभ्यास। सामान्यतया लोग आर्थिक विकास या इन्द्रियतृप्ति के लिए धार्मिक कार्यों का पालन करते हैं, किन्तु जो लोग योग में प्रगति करना चाहते हैं उनके लिए इसकी संस्तुति नहीं की जाती।

अगला महत्त्वपूर्ण वाक्यांश है मितमेध्यादनम् जिसका अर्थ यह होता है कि मनुष्य को बहुत कम खाना चाहिए। वैदिक साहित्य में आदेश है कि योगी अपनी भूख का केवल आधा खाये। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई इतना भूखा है कि एक पौंड (लगभग आधा सेर) खा सकता है, तो उसे चाहिए कि वह केवल आधा पौंड ग्रहण करे और उसके साथ चार औंस (आधा पाव) पानी पिये, चौथाई पेट वायु के आने जाने के लिए खाली रखे। यदि इस प्रकार से भोजन किया जाय तो न तो अपच होगा और न कोई रोग। योगी को श्रीमद्भागवत तथा अन्य शास्त्रों में बताई गई विधि के अनुसार ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। योगी को एकान्त स्थान में रहना चाहिए जहाँ योगाभ्यास में कोई बाधा न पहुँचे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥