श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
यच्छ्रीनिकेतमलिभि: परिसेव्यमानं
भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् ।
मीनद्वयाश्रयमधिक्षिपदब्जनेत्रं
ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
यत्—भगवान् का जो मुखमण्डल; श्री-निकेतम्—कमल; अलिभि:—भौंरों से; परिसेव्यमानम्—घिरा हुआ; भूत्या—छटा से; स्वया—अपनी; कुटिल—घुँघराले; कुन्तल—बालों का; वृन्द—झुंड के झुंड; जुष्टम्—सुशोभित; मीन—मछली का; द्वय—जोड़ा; आश्रयम्—निवास; अधिक्षिपत्—लजाने वाला; अब्ज—कमल; नेत्रम्—नेत्र वाला; ध्यायेत्—ध्यान करे; मन:-मयम्—मन में निर्मित; अतन्द्रित:—सतर्क; उल्लसत्—नाचती हुई; भ्रु—भौंहें ।.
 
अनुवाद
 
 तब योगी भगवान् के सुन्दर मुखमण्डल का ध्यान करता है, जो घुँघराले बालों, कमल जैसे नेत्रों तथा नाचती भौंहों से सुशोभित है। इसकी शोभा (छटा) के आगे भौंरों से घिरा कमल तथा तैरती हुई मछलियों की जोड़ी मात खा जाती है।
 
तात्पर्य
 यहाँ एक महत्त्वपूर्ण कथन है—ध्यायेन् मनोमयम्। मनोमयम् कल्पना नहीं है। निर्विशेषवादी सोचते हैं कि योगी अपनी इच्छानुसार किसी भी रूप की कल्पना कर सकता है, किन्तु जैसाकि यहाँ कहा गया है योगी को उस रूप का ध्यान करना चाहिए जिसका अनुभव भक्तों ने किया है। भक्तगण कभी भी भगवान् के किसी रूप की कल्पना नहीं करते। वे किसी काल्पनिक वस्तु से संतुष्ट नहीं होते। भगवान् के विभिन्न दिव्य रूप हैं; प्रत्येक भक्त एक विशेष रूप को चाहता है और उसी रूप की पूजा करते हुए भगवान् की सेवा में लग जाता है। भगवान् का यह रूप शास्त्रानुमोदित होता है। जैसाकि पहले बताया जा चुका है भगवान् के मूल रूप के आठ प्रकार के स्वरूप हैं। इन्हें मिट्टी, पत्थर, काष्ठा, रंग, बालू आदि से भक्त अपने साधन के अनुसार तैयार कर सकता है।

मन के भीतर भगवान् के स्वरूप का अंकन मनोमयम् है। भगवान् के रूप के आठ विभिन्न प्रकारों में यह अंकन सम्मिलित है। भगवान् के वास्तविक रूप का ध्यान विभिन्न रूप से प्रकट हो सकता है, किन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि किसी को उस स्वरूप की कल्पना करनी होती है। इस श्लोक में दो उपमाएँ हैं। पहली उपमा में भगवान् के मुखमण्डल की तुलना कमल से की गई है, फिर काले बालों की तुलना कमल के चारों ओर गुंजरित भौंरों के झुंड से की गई है और नेत्रों की तुलना इधर-उधर तैरती दो मछलियों से की गई है। जल में खिला कमल अत्यन्त सुन्दर लगता है यदि वह गुंजरित भौंरों से तथा मछलियों से घिरा हो। भगवान् का मुखमण्डल पूर्ण है। उनकी सुन्दरता कमल की सुन्दरता को लजाने वाली है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥