श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तं
निर्वाणमृच्छति मन: सहसा यथार्चि: ।
आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेकम्
अन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाह: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
मुक्त-आश्रयम्—मुक्ति में स्थित; यर्हि—जिस समय; निर्विषयम्—विषयों से विरक्त; विरक्तम्—उदासीन; निर्वाणम्— बुझना, अन्त; ऋच्छति—प्राप्त करता है; मन:—मन; सहसा—तुरन्त; यथा—जिस तरह; अर्चि:—लपट; आत्मानम्—मन; अत्र—इस समय; पुरुष:—व्यक्ति; अव्यवधानम्—किसी प्रकार के वियोग के बिना; एकम्—एक; अन्वीक्षते—अनुभव करता है; प्रतिनिवृत्त—मुक्त; गुण-प्रवाह:—गुणों के प्रवाह से ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार जब मन समस्त भौतिक कल्मष से रहित और विषयों से विरक्त हो जाता है, तो यह दीपक की लौ के समान हो जाता है। उस समय मन वस्तुत: परमेश्वर जैसा हो जाता है और उनसे जुड़ा हुआ अनुभव किया जाता है, क्योंकि यह भौतिक गुणों के पारस्परिक प्रवाह से मुक्त हो जाता है।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत में मन के कार्य हैं स्वीकारना तथा नकारना। जब तक मन भौतिक चेतना में रहता है, तब तक इसे भगवान् को ध्यान करने के लिए बाध्य करते रहना चाहिए, किन्तु जब मनुष्य प्रेममय भगवान् के प्रेम-भाव तक उठ जाता है, तो मन स्वत: भगवान् के विचार में तल्लीन हो जाता है। ऐसी दशा में योगी के पास भगवान् की सेवा के अतिरिक्त कोई अन्य विचार नहीं रह जाता। भगवान् की इच्छाओं के साथ-साथ मन के चलने को निर्वाण या परमेश्वर के साथ मन को एक करना कहते हैं।

निर्वाण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण भगवद्गीता में दिया गया है। प्रारम्भ में अर्जुन का मन कृष्ण के मन से विपथ हो रहा था। कृष्ण चाहते थे कि अर्जुन लड़े, किन्तु अर्जुन लडऩा नहीं चाहता था, अत: मतभेद था। किन्तु भगवान् से भगवद्गीता सुनने के बाद अर्जुन ने अपने मन को कृष्ण की इच्छानुकूल बना लिया। यह तादात्म्य कहलाता है। किन्तु इस तादात्म्य से अर्जुन तथा कृष्ण की व्यष्टि (व्यक्तित्व) समाप्त नहीं हुई। मायावादी चिन्तक इसे नहीं समझ सकते। वे सोचते हैं कि तादात्म्य के लिए व्यष्टि का क्षय होना आवश्यक है। किन्तु हम भगवद्गीता में पाते हैं कि यह व्यष्टि खोती नहीं। जब मन भगवद्प्रेम में पूर्णतया शुद्ध हो जाता है, तो यह मन भगवान् का मन बन जाता है। उस समय मन न तो पृथक् रूप से कर्म करता है न भगवान् की इच्छापूर्ति के लिए प्रेरणा से रहित होता है। व्यष्टि मुक्त आत्मा के कोई अन्य कर्म नहीं होता। प्रतिनिवृत्त-गुण-प्रवाह:। बद्ध अवस्था में मन सदैव भौतिक जगत के तीन गुणों से प्रेरित होकर कर्म में लगता है, किन्तु दिव्य अवस्था में ये भौतिक गुण भक्त के मन को विचलित नहीं कर पाते। भक्त के पास भगवान् की इच्छाओं की तुष्टि के अतिरिक्त कोई चिन्ता नहीं रहती। यह पूर्णता की सर्वोच्च अवस्था है, जिसे निर्वाण या निर्वाणमुक्ति कहते हैं। इस अवस्था में मन भौतिक इच्छा से पूरी तरह मुक्त हो जाता है।

यथार्चि:। अर्चि: का अर्थ है लौ, लपट। जब दीपक टूट जाता है या तेल चुक जाता है, तो दीपक की लौ बुझ जाती है। किन्तु वैज्ञानिक बोध के अनुसार लौ बुझती नहीं, यह संरक्षित रहती है। यही शक्ति का संरक्षण है। इसी प्रकार जब मन भौतिक स्तर पर कार्य करना बन्द कर देता है, तो यह भगवान् के कर्मों में संरक्षित रहता है। यहाँ पर मायावादी चिन्तकों के मन के कर्म के रुद्ध होने की कल्पना की व्याख्या की गई है। मानसिक क्रिया के रुद्ध होने का अर्थ है प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव से होने वाली क्रियाओं का अवरुद्ध होना।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥