श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
देहं च तं न चरम: स्थितमुत्थितं वा
सिद्धो विपश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम् ।
दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्ध: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
देहम्—भौतिक शरीर; च—तथा; तम्—वह; न—नहीं; चरम:—अन्तिम; स्थितम्—आसीन; उत्थितम्—उठा हुआ; वा—अथवा; सिद्ध:—सिद्ध जीव; विपश्यति—सोच सकता है; यत:—क्योंकि; अध्यगमत्—प्राप्त कर चुका है; स्व-रूपम्—अपनी असली पहचान; दैवात्—भाग्य के अनुसार; उपेतम्—पहुँचा हुआ; अथ—और भी; दैव वशात्—भाग्य के अनुसार; अपेतम्—गया हुआ; वास:—वस्त्र; यथा—जिस तरह; परिकृतम्—पहने गये; मदिरा- मद-अन्ध:—शराब पीने से अन्धा हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 अपना असली स्वरूप प्राप्त कर लेने के कारण पूर्णतया सिद्ध जीव को इसका कोई बोध नहीं होता है कि यह भौतिक देह किस तरह हिल-डुल रही है या काम कर रही है, जिस तरह कि नशा किया हुआ व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह अपने शरीर में वस्त्र धारण किये हैं अथवा नहीं।
 
तात्पर्य
 रूप गोस्वामी ने भक्ति-रसामृत-सिन्धु में जीवन की इस अवस्था की व्याख्या की है। जिस व्यक्ति का मन भगवान् की इच्छाओं के अनुरूप होता है और जो उसे शत प्रतिशत भगवान् की सेवा में लगाता है, वह अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को भूल जाता है।
 
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