श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षेतानन्यभावेन भूतेष्विव तदात्मताम् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
सर्व-भूतेषु—समस्त जीवों में; च—तथा; आत्मानम्—आत्मा को; सर्व-भूतानि—समस्त जीव; च—यथा; आत्मनि—परमेश्वर में; ईक्षेत—उसे देखना चाहिए; अनन्य-भावेन—समभाव से; भूतेषु—समस्त जीवों में; इव— सदृश; तत्-आत्मताम्—स्व की प्रकृति ।.
 
अनुवाद
 
 योगी को चाहिए कि समस्त जीवों में उसी एक आत्मा को देखे, क्योंकि जो कुछ भी विद्यमान है, वह सब परमेश्वर की विभिन्न शक्तियों का प्राकट्य है। इस तरह से भक्त को चाहिए कि वह समस्त जीवों को बिना भेदभाव के देखे। यही परमात्मा का साक्षात्कार है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, परमात्मा न केवल प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश करता है, अपितु वह परमाणुओं तक में प्रवेश कर जाता है। परमात्मा सर्वत्र सुप्त अवस्था में विद्यमान है और जब कोई उसकी उपस्थिति को सर्वत्र देखता है, तो वह भौतिक उपाधियों से मुक्त हो जाता है।

सर्वभूतेषु शब्द को इस प्रकार समझा जा सकता है : जीवों की चार भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं—उद्भिज (पृथ्वी से उत्पन्न), अण्डज (अण्डे से उत्वन्न), स्वेदज (पसीने या खमीर से उत्पन्न) तथा पिंडज (भ्रूण से उत्पन्न)। जीवों की इन चार श्रेणियों की ८४,००,००० योनियाँ हैं। जो व्यक्ति भौतिक उपाधियों से मुक्त हो जाता है, वह एक ही प्रकार के आत्मा को सर्वत्र या प्रत्येक जीव में देखता है। अल्पज्ञानी व्यक्ति सोचता है कि पौधे तथा घास पृथ्वी से स्वत: उग आते हैं, किन्तु जो बुद्धिमान है और जिसे आत्मज्ञान है, वह देख सकता है कि यह वृद्धि स्वत: नहीं होती; इसका कारण आत्मा है और विभिन्न परिस्थितियों में भौतिक शरीर विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। प्रयोगशाला में सडऩ की क्रिया से अनेक जीवाणु पैदा होते हैं, किन्तु इसका कारण आत्मा की उपस्थिति है। भौतिकतावादी विज्ञानी सोचता है कि अण्डे जीवरहित हैं, किन्तु यह तथ्य नहीं है। हमें वैदिक साहित्य से ज्ञात होता है कि विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न रूपों वाले जीव उत्पन्न होते हैं। चिडिय़ाँ अंडे से निकलती हैं तथा पशु एवं मनुष्य भ्रूण से उत्पन्न हैं। योगी या भक्त की पूर्ण दृष्टि इसमें होती है कि वह सर्वत्र जीवात्मा की उपस्थिति देखता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥