श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
स्वयोनिषु यथा ज्योतिरेकं नाना प्रतीयते ।
योनीनां गुणवैषम्यात्तथात्मा प्रकृतौ स्थित: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-योनिषु—काष्ठ के रूप में; यथा—जिस प्रकार; ज्योति:—अग्नि; एकम्—एक; नाना—भिन्न-भिन्न प्रकार से; प्रतीयते—प्रकट होती है; योनीनाम्—विभिन्न गर्भों में; गुण-वैषम्यात्—विभिन्न गुणों के कारण; तथा—उसी प्रकार; आत्मा—आत्मा; प्रकृतौ—भौतिक प्रकृति में; स्थित:—स्थित ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार अग्नि काष्ठ के विभिन्न प्रकारों में प्रकट होती है उसी प्रकार प्रकृति के गुणों की विभिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत शुद्ध आत्मा अपने आपको विभिन्न शरीरों में प्रकट करता है।
 
तात्पर्य
 यह समझ लेना होगा कि शरीर को उपाधि दी जाती है। भौतिक प्रकृति के तीन गुणों की अन्त:क्रिया प्रकृति है और इन गुणों के अनुसार किसी को छोटा शरीर मिलता है, तो किसी को बड़ा। उदाहरणार्थ, काष्ठ के बड़े खण्ड में अग्नि बड़ी प्रतीत होती है और एक छड़ी में छोटी लगती है। वस्तुत: अग्नि की गुणता सर्वत्र एक रहती है, किन्तु भौतिक प्रकृति का प्राकट्य ऐसा है कि ईंधन के अनुसार अग्नि छोटी या बड़ी प्रतीत होती है। इसी प्रकार विराट शरीर का आत्मा एक-से गुण वाला होते हुए भी लघु शरीर के आत्मा की अपेक्षा भिन्न होता है।

आत्मा के लघुकण विशाल आत्मा की चिनगारियों के समान हैं। सबसे महान् आत्मा तो परमात्मा है, किन्तु यह परम आत्मा लघु आत्मा से गुण में भिन्न है। वैदिक साहित्य में परमात्मा को लघु आत्मा की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला कहा गया है (नित्यो नित्यानाम्)। जो कोई परमात्मा तथा व्यष्टि आत्मा के इस अन्तर को समझता है, वह शोकरहित है और शान्तिपूर्वक रहता है। जब लघु आत्मा अपने को विशाल आत्मा के तुल्य सोचता है, तो वह माया के वश में होता है, क्योंकि यह उसकी स्वाभाविक स्थिति नहीं है। मात्र कल्पना से कोई विशाल आत्मा नहीं बन सकता।

वराह पुराण में विभिन्न आत्माओं की लघुता या विशालता का वर्णन स्वांश विभिन्नांश के रूप में पाया जाता है। स्वांश आत्मा भगवान् है और विभिन्नांश आत्माएँ या लघुकण शाश्वत रूप से लघु कण ही रहते हैं जैसाकि भगवद्गीता में पुष्टि हुई है (ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:)। लघु जीव शाश्वत अंश हैं, अत: वे कभी परमात्मा के समान नहीं हो सकते।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥