श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं दैवीं सदसदात्मिकाम् ।
दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—इस प्रकार; इमाम्—इस; स्वाम्—निज; प्रकृतिम्—भौतिक शक्ति को; दैवीम्—दैवी; सत्-असत्- आत्मिकाम्—कारण तथा कार्य से युक्त; दुर्विभाव्याम्—समझने में कठिन; पराभाव्य—जीतकर; स्व-रूपेण— स्वरूपसिद्ध स्थिति में; अवतिष्ठते—रहा आता है ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार माया के दुर्लंघ्य सम्मोहन को जीतकर योगी स्वरूपसिद्ध स्थिति में रह सकता है। यह माया इस जगत में अपने आपको कार्य-कारण रूप में उपस्थित करती है, अत: इसे समझ पाना अत्यन्त कठिन है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि माया का सम्मोहन जीव के ज्ञान को आच्छादित कर लेता है और दुर्लंघ्य है। किन्तु जो कोई कृष्ण की शरण में जाता है, वह माया के इस दुर्लंघ्य सम्मोहन को पार कर सकता है। यहाँ पर यह भी कहा गया है कि दैवी प्रकृति अर्थात् परमेश्वर की बहिरंगा शक्ति दुर्विभाव्या है अर्थात् उसे समझ पाना तथा जीत पाना अत्यन्त कठिन है। किन्तु मनुष्य को माया के इस दुर्लंघ्य जादू को जीतना होता है और यह तभी सम्भव है जब भगवान् की कृपा हो तथा जब ईश्वर स्वयं शरणागत जीव को दर्शन दें। यहाँ पर स्वरूपेणावतिष्ठते भी कहा गया है। स्वरूप का अर्थ है कि जीव को यह जानना होता है कि वह परमात्मा न होकर परमात्मा का अंश है—यही आत्म-साक्षात्कार है। अपने को झूठे ही परमात्मा के रूप में सोचना तथा अपने को सर्वव्यापी समझना स्वरूप नहीं है, यह उसकी वास्तविक स्थिति का साक्षात्कार नहीं है। वास्तविक स्थिति तो यह है कि वह अंशरूप है। यहाँ संस्तुति की गई है कि मनुष्य को वास्तविक आत्म-साक्षात्कार की स्थिति में बने रहना चाहिए। भगवद्गीता में इस समझ को ब्रह्म-साक्षात्कार के रूप में परिभाषित किया गया है।

ब्रह्म-साक्षात्कार के पश्चात् मनुष्य ब्रह्म के कार्यकलापों में लग सकता है। जब तक वह स्वरूपसिद्ध नहीं होता, वह शरीर के साथ झूठी पहचान पर आधारित कार्यों में लगा रहता है। जब वह अपने वास्तविक स्व (आत्म) में स्थित होता है, तभी ब्रह्म-साक्षात्कार के कार्य- कलाप प्रारम्भ होते हैं। मायावादी चिन्तकों का कथन है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद सारे कर्म (कार्यकलाप) रुक जाते हैं, किन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं। जब आत्मा पदार्थ के आवरण के भीतर स्थित रह कर, जो कि असामान्य स्थिति है, इतना सक्रिय रह सकता है, तो फिर उसके मुक्त रहने पर उसकी कार्यशीलता से कैसे इनकार किया जा सकता है? यहाँ पर एक उदाहरण उद्धृत किया जा सकता है। जब कोई मनुष्य अपनी रुग्ण अवस्था में अत्यधिक सक्रिय हो तो फिर कोई यह कैसे कल्पना कर सकता है कि रोगमुक्त होने की अवस्था में निष्क्रिय होगा? स्वाभाविक है कि जब कोई व्यक्ति रोग से मुक्त होता है, तो उसके कार्यकलाप शुद्ध होते हैं। यह कहा जा सकता है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के कार्य बद्ध जीवन के कार्यों से भिन्न होते हैं। भगवद्गीता (१८.५४) में इंगित किया गया है—जब कोई अपने आपको ब्रह्म समझ लेता है, तो भक्ति का शुभारम्भ होता है। मद्-भक्तिं लभते पराम्—ब्रह्म-साक्षात्कार के पश्चात् मनुष्य भगवान् की भक्ति में लग सकता है। अत: भगवान् की भक्ति ब्रह्म-साक्षात्कार का कर्म है।

जो लोग भक्ति में लगे हुए हैं उनके लिए माया का जादू नहीं होता और उनकी स्थिति परम पूर्ण होती है। पूर्ण के अंशरूप जीवात्मा का धर्म है कि पूर्ण की सेवा करे। यही जीवन की चरम सिद्धि है।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध के अन्तर्गत “भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश” नामक अट्ठाइसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥