श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
एतैरन्यैश्च पथिभिर्मनो दुष्टमसत्पथम् ।
बुद्ध्या युञ्जीत शनकैर्जितप्राणो ह्यतन्द्रित: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
एतै:—इनसे; अन्यै:—दूसरे से; च—यथा; पथिभि:—विधियों से; मन:—मन; दुष्टम्—कलुषित; असत्-पथम्— सांसारिक भोग के पथ पर; बुद्ध्या—बुद्धि से; युञ्जीत—वश में करना चाहिए; शनकै:—धीरे-धीरे; जित-प्राण:— प्राणवायु को स्थिर करके; हि—निस्सन्देह; अतन्द्रित:—सतर्क ।.
 
अनुवाद
 
 इन विधियों से या अन्य किसी सही विधि से मनुष्य को अपने दूषित तथा भौतिक भोग के द्वारा सदैव आकृष्ट होने वाले चंचल मन को वश में करना चाहिए और इस तरह अपने आपको भगवान् के चिन्तन में स्थिर करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 एतैरन्यैश्च। सामान्य योगक्रिया में विधि-विधानों का पालन, विभिन्न आसनों का अभ्यास, प्राणवायु चक्र में मन को केन्द्रित करना तथा भगवान् का उनकी वैकुण्ठ लीलाओं में चिन्तन करना सम्मिलित हैं। यह योग की सामान्य विधि है। यही एकाग्रता (ध्यान) अन्य संस्तुत विधियों से भी प्राप्त की जा सकती है, अत: अन्यैश्च शब्दों का प्रयोग हुआ है। मुख्य बात यह है कि भौतिक आसक्ति के कारण कल्मषग्रस्त मन को वश में करके उसे पूर्ण परुषोत्तम भगवान् में स्थिर करना होता है। इसे ऐसी किसी वस्तु पर जो शून्य या निराकार हो स्थिर नहीं किया जा सकता। इसी कारण से किसी मानक योग-शास्त्र में शून्यवाद तथा निर्विशेषवाद की तथाकथित योग विधियों की संस्तुति नहीं की गई है। वास्तविक योगी तो भक्त है, क्योंकि उसका मन सदैव भगवान् कृष्ण की लीलाओं में केन्द्रित रहता है। फलत: कृष्णभक्ति सर्वोच्च योगपद्धति है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥