श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 28: भक्ति साधना के लिए कपिल के आदेश  »  श्लोक 9

 
श्लोक
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकै: ।
प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरमचञ्चलम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
प्राणस्य—प्राणवायु के; शोधयेत्—स्वच्छ करे; मार्गम्—रास्ते को; पूर-कुम्भक-रेचकै:—श्वास खींचकर, रोककर तथा निकालकर; प्रतिकूलेन—उलटने से; वा—अथवा; चित्तम्—मन को; यथा—जिसमें; स्थिरम्—स्थिर, स्थायी; अचञ्चलम्—अवरोधों से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 योगी को चाहिए कि प्राणवायु के मार्ग को निम्नलिखित विधि से श्वास लेकर इस प्रकार से स्वच्छ करे—पहले बहुत गहरी श्वास अंदर ले, फिर उस श्वास को धारण किये रहे और अन्त में श्वास बाहर निकाल दे। या फिर इस विधि को उलट कर योगी पहले श्वास निकाले, फिर श्वास रोके रखे और अन्त में श्वास भीतर ले जाय। ऐसा इसलिए किया जाता है, जिससे मन स्थिर हो और बाहरी अवरोधों से मुक्त हो सके।
 
तात्पर्य
 ये प्राणायाम मन को नियन्त्रित करने तथा उसे भगवान् में स्थिर करने के लिए किये जाते हैं। स वै मन:कृष्णपदारविन्दयो:—भक्त अम्बरीष महाराज चौबीसों घण्टे अपना मन कृष्ण के चरणकमलों में स्थिर रखते थे। कृष्णभावनामृत की विधि में हरे कृष्ण कीर्तन किया जाता है और शब्द को ध्यानपूर्वक सुना जाता है, जिससे मन कृष्ण के नाम की दिव्य ध्वनि में स्थिर हो जाता है और यह नाम कृष्ण के व्यक्तित्व से अभिन्न है। प्राणवायु के मार्ग को स्वच्छ करने की संस्तुत विधि द्वारा मन को वश में करने का वास्तविक प्रयोजन तुरन्त ही प्राप्त हो जाता है यदि मनुष्य अपने मन को सीधे भगवान् के चरणकमलों में स्थिर कर देता है। हठयोग या प्राणायाम की विधि उन लोगों के लिए है, जो देहात्मबुद्धि में अत्यधिक तल्लीन रहते हैं, किन्तु जो केवल हरे कृष्ण का कीर्तन कर सकता है, वह अधिक सुगमतापूर्वक मन को स्थिर कर सकता है।
श्वास मार्ग को स्वच्छ करने की तीन भिन्न विधियाँ बताई गई हैं—पूरक, कुम्भक तथा रेचक। श्वास भीतर ले जाना पूरक कहलाता है, उसे भीतर रोके रखना कुम्भक है और श्वास को बाहर निकालना रेचक है। इन विधियों को उलट कर भी किया जा सकता है। श्वास निकालने के बाद वायु को कुछ काल तक बाहर रखने के बाद पुन: श्वास को भीतर ले जाया जाय। जिन नाडिय़ों के द्वारा श्वास लेने तथा श्वास छोडऩे की क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं, वे इड़ा तथा पिंगला कहलाती हैं। इड़ा तथा पिंगला को स्वच्छ (मार्जन) करने का चरम उद्देश्य मन को भौतिक सुखोपभोग से मोडऩा है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—मन ही मनुष्य का शत्रु है और मित्र है, इसकी स्थिति जीव के साथ भिन्न-भिन्न आचरणों के अनुसार बदलती रहती है। यदि हम अपने मन को भौतिक भोगों की ओर मोड़ते हैं, तो हमारा मन हमारा शत्रु बन जाता है, किन्तु यदि हम अपने मन को कृष्ण के चरणकमलों में केन्द्रित करते हैं, तो मन हमारा मित्र बन जाता है। चाहे पूरक, कुम्भक तथा रेचक की योग-पद्धति हो या कि कृष्ण शब्द (नाम) या कृष्ण के स्वरूप पर मन को स्थिर करना हो, इनसे एक ही उद्देश्य की प्राप्ति होती है। भगवद्गीता (८.८) में कहा गया है कि मनुष्य को चाहिए कि प्राणायाम करे (अभ्यासयोगयुक्तेन)। इन नियन्त्रण विधियों से मन बाहरी विचारों की ओर नहीं जाएगा (चेतसा नान्यगामिना)। इस प्रकार वह निरन्तर अपने मन को भगवान् में स्थिर करके उन्हें प्राप्त कर सकता है (याति)।

इस युग में आसन तथा श्वास नियन्त्रण की योग-पद्धति का अभ्यास कर सकना मनुष्य के लिए दुष्कर है। अत: भगवान् चैतन्य ने संस्तुति की है—कीर्तनीय:सद-हरि:—मनुष्य को चाहिए कि सदैव सर्वाधिक उपयुक्त कृष्ण के पवित्र नाम का जप करे। कृष्ण-नाम तथा परम पुरुष कृष्ण अभिन्न हैं। अत: यदि कोई हरे कृष्ण के सुनने तथा कीर्तन करने में मन को केन्द्रित करता है, तो समान फल प्राप्त होता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥