श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक
देवहूतिरुवाच
लक्षणं महदादीनां प्रकृते: पुरुषस्य च ।
स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम् ॥ १ ॥
यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते ।
भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरश: प्रभो ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
देवहूति: उवाच—देवहूति ने कहा; लक्षणम्—लक्षण; महत्-आदीनाम्—महत्-तत्त्व आदि का; प्रकृते:—प्रकृति का; पुरुषस्य—आत्मा का; च—तथा; स्वरूपम्—स्वभाव; लक्ष्यते—वर्णन किया जाता है; अमीषाम्—उनका; येन— जिससे; तत्-पारम-अर्थिकम्—उनकी असली प्रकृति; यथा—जिस प्रकार; साङ्ख्येषु—सांख्य दर्शन में; कथितम्— व्याख्यायित; यत्—जिसका; मूलम्—चरम परिणति; तत्—वह; प्रचक्षते—कहते हैं; भक्ति-योगस्य—भक्ति का; मे—मुझको; मार्गम्—पथ; ब्रूहि—कहिये; विस्तरश:—विस्तार से; प्रभो—हे भगवान् कपिल ।.
 
अनुवाद
 
 देवहूति ने जिज्ञासा की : हे प्रभु, आप सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तथा आत्मा के लक्षणों का अत्यन्त वैज्ञानिक रीति से पहले ही वर्णन कर चुके हैं। अब मैं आपसे प्रार्थना करूँगी कि आप भक्ति के मार्ग की व्याख्या करें, जो समस्त दार्शनिक प्रणालियों की चरम परिणति है।
 
तात्पर्य
 इसी उन्तीसवें अध्याय में भक्ति की महिमा की विस्तृत व्याख्या की गई है। साथ ही बद्धजीव पर काल के प्रभाव का भी वर्णन हुआ है। काल के प्रभाव का विस्तार से वर्णन करने का उद्देश्य बद्धजीव को उसके भौतिक कार्यकलापों से विरत करना है, जिन्हें केवल समय का अपव्यय माना जाता है। पिछले अध्याय में प्रकृति, आत्मा तथा परमेश्वर या परमात्मा का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जा चुका है और इस अध्याय में भक्तियोग अथवा भक्ति के सिद्धान्तों—भगवान् तथा जीव के बीच नित्य सम्बन्ध होने के कारण कार्यों के निष्पादन—की व्याख्या की गई है।

भक्तियोग अथवा भक्ति समस्त दर्शन-पद्धतियों का मूल सिद्धान्त है। जिस किसी दर्शन का लक्ष्य भगवद्भक्ति नहीं है, वह मात्र कपोल कल्पना है। किन्तु इसमें भी सन्देह नहीं कि बिना दार्शनिक आधार के भक्तियोग न्यूनाधिक भावावेश है। मनुष्य दो प्रकार के होते हैं। कुछ लोग स्वयं को बौद्धिक रूप से उन्नत मानते हैं और केवल चिन्तन तथा ध्यान करते हैं और दूसरे लोग वे हैं जिनके कथन का कोई दार्शनिक आधार नहीं होता। इनमें से किसी को भी जीवन का उच्चतम लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता और यदि हो भी तो अनेकानेक वर्ष लग जाते हैं। इसलिए वैदिक साहित्य का सुझाव है कि परमेश्वर, जीव तथा इन दोनों का शाश्वत सम्बन्ध—ये तीन तत्त्व हैं और जीवन का उद्देश्य भक्ति के सिद्धान्तों का पालन करते हुए अन्तत: पूर्णतया भगवद्भक्ति तथा भगवद्प्रेम के साथ परमेश्वर के धाम को प्राप्त करना है।

सांख्य दर्शन सारे जगत का विश्लेषणात्मक अध्ययन है। मनुष्य को हर वस्तु की प्रकृति तथा उसके गुणों का परीक्षण करके समझना होता है। यह ज्ञानार्जन कहलाता है। किन्तु मनुष्य को जीवन का लक्ष्य या ज्ञानार्जन के मूल सिद्धान्त—भक्तियोग—को प्राप्त किये बिना मात्र ज्ञानार्जन ही नहीं करते रहना चाहिए। यदि हम भक्तियोग का परित्याग करके वस्तुओं की प्रकृति के विषय में विश्लेषणात्मक अध्ययन करते रहते हैं, तो इसका परिणाम कुछ भी नहीं निकलेगा। भागवत में कहा गया है कि ऐसा कार्य धान कूटने के समान है। यदि धान में से चावल (अन्न) निकाल लिया जाय तो भुस कूटने से क्या लाभ? प्रकृति, जीव तथा परमात्मा के वैज्ञानिक अध्ययन से भगवद्भक्ति का मूल सिद्धान्त समझा जा सकता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥