श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक
मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये ।
मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ ११ ॥
लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम् ।
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्ति: पुरुषोत्तमे ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
मत्—मेरा; गुण—गुण; श्रुति—सुनकर; मात्रेण—केवल; मयि—मेरे प्रति; सर्व-गुहा-आशये—प्रत्येक के हृदय में रहते हुए; मन:-गति:—हृदय का मार्ग; अविच्छिन्ना—समुद्र की ओर; यथा—जिस तरह; गङ्गा—गंगा के; अम्भस:— जल का; अम्बुधौ—समुद्र की ओर; लक्षणम्—प्राकट्य; भक्ति-योगस्य—भक्ति का; निर्गुणस्य—अमिश्रित; हि— निस्सन्देह; उदाहृतम्—प्रकट; अहैतुकी—बिना कारण के; अव्यवहिता—अभिन्न; या—जो; भक्ति:—भक्ति; पुरुष- उत्तमे—भगवान् के प्रति ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य का मन प्रत्येक व्यक्ति के हृदय के भीतर वास करने वाले भगवान् के दिव्य नाम तथा गुणों के श्रवण की ओर तुरन्त आकृष्ट हो जाता है, तो निर्गुण भक्ति का प्राकट्य होता है। जिस प्रकार गंगा का पानी स्वभावत: समुद्र की ओर बहता है, उसी प्रकार ऐसा भक्तिमय आह्लाद बिना रोक-टोक के परमेश्वर की ओर प्रवाहित होता है।
 
तात्पर्य
 इस निर्गुण शुद्ध भक्ति का मूल सिद्धान्त ईश्वर का प्रेम है। मद्गुणश्रुतिमात्रेण का अर्थ है “भगवान् के दिव्य गुणों के श्रवण मात्र से।” ये गुण निर्गुण कहलाते हैं। परमेश्वर प्रकृति के गुणों से अकलुषित हैं, अत: शुद्ध भक्त के लिए आकर्षक हैं। ऐसा आकर्षण प्राप्त करने के लिए ध्यान के अभ्यास की आवश्यकता नहीं होती। शुद्ध भक्त पहले से ही दिव्य अवस्था को प्राप्त रहता है और उसके तथा परमेश्वर के बीच का आकर्षण (सहज) होता है, जिसकी तुलना समुद्र की ओर प्रवाहित होने वाली गंगा नदी से की जा सकती है। गंगाजल के प्रवाह को किसी तरह रोका नहीं जा सकता, इसी प्रकार भगवान् के दिव्य नाम, रूप तथा लीलाओं के प्रति शुद्ध भक्त के आकर्षण को किसी भौतिक परिस्थिति के द्वारा रोका नहीं जा सकता। इस प्रसंग में अविच्छिन्न शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है “बिना रुकावट के।” शुद्ध भक्त के भक्ति-प्रवाह को कोई भौतिक परिस्थिति रोक नहीं सकती।

अहैतुकी शब्द का अर्थ “बिना कारण” है। एक शुद्ध भक्त भगवान् की प्रेममयी सेवा किसी कारणवश या भौतिक अथवा आध्यात्मिक लाभ के वशीभूत होकर नहीं करता। विशुद्ध भक्ति का यह पहला लक्षण है। अन्याभिलाषिता शून्यम्। भक्ति द्वारा उसे किसी इच्छा की पूर्ति नहीं करनी होती। ऐसी भक्ति पुरुषोत्तम के अतिरिक्त अन्य किसी के निमित्त नहीं होती। कभी- कभी छद्म-भक्त अनेक देवताओं के प्रति यह सोचकर भक्ति प्रदर्शित करते हैं कि देवताओं के ये रूप भगवान् के समरूप हैं। किन्तु यहाँ इसका विशेष रूप से उल्लेख है कि भक्ति केवल भगवान् नारायण, विष्णु या कृष्ण के निमित्त होती है, अन्य किसी के लिए नहीं।

अव्यवहिता का अर्थ है “बिना विश्राम के।” शुद्ध भक्त को बिना विश्राम के चौबीसों घंटे भगवान् की सेवा मे लगे रहना चाहिए; उसका जीवन ऐसा ढल जाता है कि उसका प्रत्येक क्षण भगवान् की किसी न किसी प्रकार की भक्ति में बीतता है। अव्यवहिता का दूसरा अर्थ यह है कि भक्त तथा भगवान् के स्वार्थ एक ही स्तर पर होते हैं। भक्त का स्वार्थ परमेश्वर की इच्छापूर्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भगवान् के प्रति ऐसी ऐच्छिक सेवा दिव्य होती है और प्रकृति के गुणों द्वारा कभी कलुषित नहीं होती। ये शुद्ध भक्ति के लक्षण हैं और शुद्ध भक्ति प्रकृति के सारे कल्मषों से मुक्त होती है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥