श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
अहमुच्चावचैर्द्रव्यै: क्रिययोत्पन्नयानघे ।
नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिन: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
अहम्—मैं; उच्च-अवचै:—विविध; द्रव्यै:—सामग्री से; क्रियया—धार्मिक अनुष्ठानों से; उत्पन्नया—सम्पन्न; अनघे— हे निष्कलुष माता; न—नहीं; एव—निश्चय ही; तुष्ये—प्रसन्न होता हूँ; अर्चित:—पूजित; अर्चायाम्—प्रतिमा रूप में; भूत-ग्राम—अन्य जीवों को; अवमानिन:—अनादर करने वालों से ।.
 
अनुवाद
 
 हे माते, भले ही कोई पुरुष सही अनुष्ठानों तथा सामग्री द्वारा मेरी पूजा करता हो, किन्तु यदि वह समस्त प्राणियों में मेरी उपस्थिति से अनजान रहता है, तो वह मन्दिर में मेरे विग्रह की कितनी ही पूजा क्यों न करे, मैं उससे कभी प्रसन्न नहीं होता।
 
तात्पर्य
 मन्दिर में अर्चा विग्रह पूजन के ६४ विविध प्रकार हैं। विग्रह को अनेक वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं—कुछ बहुमूल्य तो कुछ कम मूल्यवान। भगवद्गीता में बताया गया है : “यदि कोई भक्त मुझे एक छोटा-सा फूल, एक पत्ती, कुछ जल या छोटा-सा फल भी अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार कर लेता हूँ।” वास्तविक प्रयोजन तो ईश्वर के प्रति प्रेमा-भक्ति को प्रकट करना है, भेंटें तो गौण हैं। यदि भगवान् के प्रति प्रेमा-भक्ति उत्पन्न नहीं हो पाई और यदि बिना वास्तविक भक्ति के भोजन, फल तथा फूल अर्पित किये जाते हैं, तो इस भेंट को भगवान् स्वीकार नहीं करते। हम भगवान् को घूस नहीं दे सकते। वे इतने महान् हैं कि हमारी घूस का कोई महत्त्व नहीं रहता। न ही उनके पास अभाव है। वे स्वयं पूर्ण हैं, तो फिर हम उन्हें क्या भेंट कर सकते हैं? हर वस्तु उन्हीं के द्वारा उत्पन्न है। हम केवल अपना प्रेम तथा कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

यह कृतज्ञता तथा ईश-प्रेम उस शुद्ध भक्त द्वारा प्रकट होता है, जो यह जानता है कि भगवान् हर प्राणी में निवास करते हैं। इस तरह, मन्दिर-पूजा में प्रसाद वितरण सम्मिलित है। ऐसा नहीं है कि कोई अपने निजी घर में मन्दिर बना ले, भगवान् को कुछ अर्पित करे और तब खाये। हाँ, भगवान् के साथ अपना सम्बन्ध समझे बिना भोजन बनाकर खाने की अपेक्षा ऐसा करना उत्तम है। जो लोग ऐसा करते हैं, वे पशुओं के तुल्य हैं। किन्तु जो भक्त ज्ञान के उच्चस्तर तक पहुँचना चाहता है उसे जानना चाहिए कि भगवान् प्रत्येक जीव में विद्यमान हैं और जैसाकि पिछले श्लोक में बताया गया है उसे अन्य प्राणियों पर कृपालु होना चाहिए। भक्त को भगवान् की पूजा करनी चाहिए, अपने समधर्मियों के साथ मित्र-भाव रखना चाहिए और अज्ञानियों के प्रति दयालु होना चाहिए। अज्ञानी जीवों के प्रति कृपा दिखाने के लिए प्रसाद वितरण करना चाहिए। जो लोग भगवान् पर भेंट चढ़ाते हैं उनके लिए आवश्यक है कि अज्ञानी जन-समूह को प्रसाद बाँटें।

असली प्रेम तथा भक्ति भगवान् को ग्राह्य है। यदि मनुष्य भूखा न हो और उसको अनेक बहुमूल्य भोज्य पदार्थ भेंट किये जाँय तो यह उसके लिए व्यर्थ है। इसी प्रकार भले ही हम विग्रह को अनेक बहुमूल्य सामग्री अर्पित करें, किन्तु यदि हममें भक्तिभाव नहीं है और भगवान् की सर्वत्र उपस्थिति का बोध नहीं है, तो हममें भक्ति का अभाव है, ऐसी अज्ञान की अवस्था में हम भगवान् को स्वीकार्य कोई वस्तु भेंट नहीं कर सकते।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥