श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
जीवा: श्रेष्ठा ह्यजीवानां तत: प्राणभृत: शुभे ।
त: सचित्ता: प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तय: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
जीवा:—जीव; श्रेष्ठा:—अधिक अच्छे; हि—निस्सन्देह; अजीवानाम्—अचेतन पदार्थों से; तत:—उनकी अपेक्षा; प्राण-भृत:—जीवन के लक्षणों से युक्त जीव; शुभे—हे कल्याणी माता; तत:—उनकी अपेक्षा; स-चित्ता:— विकसित चेतना से युक्त जीव; प्रवरा:—श्रेष्ठ; तत:—उनसे; च—तथा; इन्द्रिय-वृत्तय:—अनुभूति से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 हे कल्याणी माँ, जीवात्माएँ अचेतन पदार्थों से श्रेष्ठ हैं और इनमें से जो जीवन के लक्षणों से युक्त हैं, वे श्रेष्ठ हैं। इनकी अपेक्षा विकसित चेतना वाले पशु श्रेष्ठ हैं और इनसे भी श्रेष्ठ वे हैं जिनमें इन्द्रिय अनुभूति विकसित हो चुकी है।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में बताया गया है कि जीव का सम्मान दान तथा मैत्री भाव से होना चाहिए। इस श्लोक में तथा अगले श्लोकों में विभिन्न कोटि के जीवों का वर्णन किया गया है, जिससे लोग जान सकें कि कब दान देना चाहिए और कब मित्रता का व्यवहार करना चाहिए। उदाहरणार्थ, शेर एक जीव है, भगवान् का अंश है और परमेश्वर इसके हृदय में परमात्मा रूप में निवास करते हैं। किन्तु क्या इसका अर्थ यह होता है कि हम शेर से मित्रता का व्यवहार करें? कदापि नहीं। हमें उसके साथ भिन्न प्रकार से व्यवहार करना होगा, हमें प्रसाद के रूप में दान देना होगा। जंगल में रहने वाले अनेक सन्तजन शेरों के साथ मैत्रीभाव नहीं बरतते, किन्तु वे उन्हें प्रसाद देते हैं। शेर आते हैं, प्रसाद लेते हैं और चले जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कुत्ते करते हैं। वैदिक प्रथा के अनुसार कुत्ते को घर के भीतर नहीं जाने देते। अपनी गन्दगी के कारण कुत्तों तथा बिल्लियों को भले घरों में घुसने नहीं दिया जाता, किन्तु उन्हें ऐसी शिक्षा दी जाती है कि वे घर के बाहर खड़े रहें। दयालु गृहस्वामी घर से प्रसाद लाकर इन्हें देता है, वे खाते हैं और चले जाते हैं। हमें निम्न जीवों के प्रति सदयता का व्यवहार करना चाहिए, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं होता कि हम उनके साथ उसी तरह व्यवहार करें जैसा अन्य मनुष्यों के साथ करते हैं। समता का भाव तो रहना चाहिए किन्तु यह व्यवहार करने में भेद होना चाहिए। हमारा भेदभाव किस प्रकार का हो इसका उल्लेख अगले छह श्लोकों में दिया गया है।

पहला वर्गीकरण पत्थर जैसे निर्जीव एवं सजीव प्राणी में किया जाता है। कभी-कभी पत्थर में भी मानो जीवन प्रकट हो जाता है। अनुभव से यह ज्ञात है कि कुछ पहाडिय़ाँ तथा पर्वत वृद्धि करते हैं। इसका कारण पत्थर के भीतर आत्मा की उपस्थिति है। जीवित अवस्था का दूसरा लक्षण है चेतना का विकास और इससे भी आगे अनुभूति का विकास। महाभारत के ‘मोक्षधर्म पर्व’ में यह बताया गया है कि वृक्षों में अनुभूति होती है—वे देख तथा सूँघ सकते हैं। हमें अनुभव है कि वृक्ष देख सकते हैं। कभी-कभी विशाल वृक्ष अपनी वृद्धि के दौरान व्यवधानों से बचने के लिए अपनी वृद्धि की दिशा बदल देते हैं। इसका अर्थ हुआ कि वृक्ष देख सकता है और महाभारत के अनुसार तो वृक्ष सूँघ भी सकता है। इससे अनुभूति का विकास संकेत मिलता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥