श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
विरागो येन पुरुषो भगवन्सर्वतो भवेत् ।
आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृती: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
विराग:—विरक्त; येन—जिससे; पुरुष:—व्यक्ति; भगवन्—हे प्रभु; सर्वत:—पूर्णत:; भवेत्—हो सके; आचक्ष्व— कृपया वर्णन करें; जीव-लोकस्य—जनसामान्य के लिए; विविधा:—अनेक; मम—मेरा; संसृती:—जन्म-मरण का चक्र ।.
 
अनुवाद
 
 देवहूति ने आगे कहा : हे प्रभु, कृपया मेरे तथा जन-साधारण दोनों के लिए जन्म- मरण की निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन करें, जिससे ऐसी विपदाओं को सुनकर हम इस भौतिक जगत के कार्यों से विरक्त हो सकें।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में संसृती: शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। श्रेय:-सृति का अर्थ है भगवान् की ओर अग्रसर होने का प्रशस्त मार्ग और संसृति का अर्थ है जन्म-मरण के पथ पर संसार के गहनतम भाग की ओर निरन्तर यात्रा। जिन लोगों को इस जगत, ईश्वर तथा उनके वास्तविक घनिष्ठ सम्बन्ध का ज्ञान नहीं है, वे सभ्यता की भौतिक प्रगति के नाम पर संसार के अंधकारमय क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं। संसार के अंधकारमय क्षेत्र में प्रविष्ट होने का अर्थ है मनुष्य-योनि के अतिरिक्त अन्य योनियों में प्रवेश करना। अज्ञानी पुरुष यह नहीं जानते कि इस जीवन के पश्चात् वे प्रकृति की मुट्ठी में होंगे और उन्हें ऐसा जीवन दिया जा सकता है, जो रुचिकर न हो। जीव को किस तरह विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त होते हैं इसका वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा। जन्म तथा मृत्यु में शरीरों का निरन्तर परिवर्तन संसार कहलाता है। देवहूति अपने यशस्वी पुत्र कपिल मुनि से प्रार्थना करती हैं कि वे इस निरन्तर यात्रा की व्याख्या करें जिससे बद्धजीवों को पता चले कि वे भक्तियोग के मार्ग को न समझने के कारण पतन के मार्ग की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥