श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तम: ।
ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्तत: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—उनमें से; वर्णा:—वर्ग; च—तथा; चत्वार:—चार; तेषाम्—उनमें से; ब्राह्मण:—ब्राह्मण; उत्तम:—सर्वश्रेष्ठ; ब्राह्मणेषु—ब्राह्मणों में से; अपि—भी; वेद—वेदों का; ज्ञ:—जानने वाला; हि—निश्चय ही; अर्थ—प्रयोजन; ज्ञ:— जानने वाला; अभ्यधिक:—श्रेष्ठ; तत:—उससे ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्यों में वह समाज सर्वोत्तम है, जो गुण तथा कर्म के अनुसार विभाजित किया गया है और जिस समाज में बुद्धिमान जनों को ब्राह्मण पद दिया जाता है, वह सर्वोत्तम समाज है। ब्राह्मणों में से जिसने वेदों का अध्ययन किया है, वही सर्वोत्तम है और वेदज्ञ ब्राह्मणों में भी वेद के वास्तविक तात्पर्य को जानने वाला सर्वोत्तम है।
 
तात्पर्य
 गुण तथा कर्म के अनुसार मानव समाज का चार भागों में वर्गीकरण अत्यन्त वैज्ञानिक है। अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रणाली भारत में वर्तमान जाति प्रथा के कारण दूषित हो चुकी है। किन्तु ऐसा लगता है कि यह प्रणाली दीर्घकाल से चली आ रही है, क्योंकि इसका उल्लेख श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता में हुआ है। जब तक मानव समाज में बुद्धिमान वर्ग, योद्धा वर्ग, व्यापारी वर्ग तथा श्रमिक वर्ग के रूप में सामाजिक विभाजन
नहीं होगा जब तक सदैव ऊहापोह बना रहेगा कि कौन किस उद्देश्य से कर्म कर रहा है। जो व्यक्ति परम सत्य को समझ सके वह ब्राह्मण है और जब ऐसा ब्राह्मण वेदज्ञ होता है, तो वह वेदों का प्रयोजन समझ सकता है। वेदों का प्रयोजन पूर्ण ब्रह्म को समझना है। जो व्यक्ति परम सत्य को तीन अवस्थाओं में—ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के रूप में समझता है और जो भगवान् का अर्थ समझता है, वह ब्राह्मणों में श्रेष्ठ अथवा वैष्णव माना जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥