श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरित: ।
ययोरेकतरेणैव पुरुष: पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
भक्ति-योग:—भक्ति; च—तथा; योग:—योग; च—तथा; मया—मेरे द्वारा; मानवि—हे मनुपुत्री; उदीरित:—वर्णित; ययो:—जिस दो का; एकतरेण—किसी एक से; एव—अकेला; पुरुष:—पुरुष; पुरुषम्—परम पुरुष को; व्रजेत्— प्राप्त कर सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 हे माता, हे मनुपुत्री, जो भक्त इस प्रकार से भक्ति तथा योग का साधन करता है उसे केवल भक्ति से ही परम पुरुष का धाम प्राप्त हो सकता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर भगवान् कपिलदेव ने ठीक-ठीक बताया है कि ‘अष्टाङ्ग योग’ इस उद्देश्य से सम्पन्न किया जाता है, जिससे भक्तियोग की पूर्ण अवस्था प्राप्त हो सके। मनुष्य को केवल आसन लगाने का अभ्यास करके तथा अपने को पूर्ण समझ कर सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ध्यान के द्वारा उसे भक्तियोग की अवस्था प्राप्त करनी चाहिए। जैसाकि पहले कहा जा चुका है योगी को चरणतल से पाँवों, घुटनों, जाँघों से होते हुए वक्षस्थल और गले तक भगवान् विष्णु के रूप का ध्यान करना चाहिए और धीरे-धीरे उठते हुए उनके मुखमण्डल तथा आभूषणों तक पहुँचना चाहिए। निराकार में ध्यान का कोई प्रश्र नहीं रहता।

जब भगवान् के इस प्रकार विस्तृत ध्यान के बाद भगवत्प्रेम की बारी आती है, तो यही स्तर भक्तियोग का है और इस स्तर पर उसे दिव्य प्रेमवश भगवान् की वास्तविक सेवा करनी चाहिए। जो कोई योग का अभ्यास करके भक्तियोग तक पहुँचता है, वह भगवान् को उनके दिव्य धाम में प्राप्त करता है। यहाँ पर स्पष्ट रूप से कहा गया है, पुरुष: पुरुषं व्रजेत्—जीव परम पुरुष के पास जाता है। गुणात्मक दृष्टि से जीव तथा भगवान् एक हैं, दोनों ही पुरुष कहलाते हैं। जीव तथा भगवान् दोनों में पुरुष के गुण होते हैं। पुरुष का अर्थ है ‘भोक्ता’ और भोग की भावना जीव तथा परमेश्वर दोनों में पाई जाती है। अन्तर इतना है कि दोनों में भोग की मात्रा बराबर नहीं होती। जीव भगवान् के तुल्य आनन्द का अनुभव नहीं कर पाता। यहाँ एक निर्धन तथा एक धनी व्यक्ति का दृष्टान्त लिया जा सकता है—दोनों में भोग की इच्छा उपस्थित है, किन्तु जब निर्धन व्यक्ति अपनी इच्छाओं को धनी व्यक्ति के साथ जोड़ देता है और जब धनी तथा निर्धन व्यक्ति में परस्पर सहयोग होता है, तो भोग समान रूप से भोगा जाता है। यह भक्तियोग जैसा है। पुरुष: पुरुषं व्रजेत—जब जीव भगवान् के धाम में प्रवेश करता है और उनको आनन्द प्रदान करते हुए उन्हें सहयोग पहुँचाता है, तो उसे उतना ही आनन्द या वही सुविधा प्राप्त होती है, जो भगवान् को होती है।

इसके विपरीत जब वह भगवान् की नकल करके भोग करना चाहता है, तो उसकी इच्छा माया कहलाती है और यह उसे भौतिक जगत में ला देती है। जो जीव अपने लिए ही भोग करना चाहता है और ईश्वर को कोई सहयोग नहीं देता वह भौतिकतावादी जीवन में लगा होता है। किन्तु ज्योंही वह अपना भोग पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ जोड़ देता है कि वह आध्यात्मिक जीवन बिताने लगता है। यहाँ पर एक उदाहरण दिया जा सकता है—शरीर के विभिन्न अंग स्वतन्त्र रूप से जीवन का आनन्द नहीं उठा सकते। उन्हें पूर्ण शरीर के साथ सहयोग करना चाहिए तथा पेट को भोजन देना चाहिए। ऐसा करने पर शरीर के भिन्न-भिन्न अंग सारे शरीर के सहयोग से समान रूप से भोग करते हैं। ‘अचिन्त्य भेदाभेद’ का यही दर्शन है—अर्थात् एकसाथ एकत्व तथा अन्तर। ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध जीव जीवन का आनन्द नहीं भोग सकता। उसे भक्तियोग के अभ्यास द्वारा अपने सारे कार्यकलाप भगवान् के साथ साथ करने होंगे।

यहाँ यह कहा गया है कि या तो योगविधि से या भक्तियोग के द्वारा भगवान् तक पहुँचा जा सकता है। यह संकेत करता है कि यथार्थ में योग तथा भक्तियोग में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि दोनों का लक्ष्य विष्णु है। किन्तु आधुनिक युग में एक नवीन योगपद्धति निर्मित की गई है, जो शून्य तथा निराकार को लक्ष्य बनाती है। वस्तुत: योग का अर्थ है विष्णु के स्वरूप का ध्यान। यदि प्रामाणिक निर्देश के अनुसार योगाभ्यास किया जाय तो योग तथा भक्तियोग में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

 
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