श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मण: परमात्मन: ।
परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—यह; भगवत:—भगवान् का; रूपम्—रूप; ब्रह्मण:—ब्रह्म का; परम-आत्मन:—परमात्मा का; परम्—दिव्य; प्रधानम्—प्रधान; पुरुषम्—पुरुष; दैवम्—दैवी, आध्यात्मिक; कर्म-विचेष्टितम्—जिनके कार्यकलाप ।.
 
अनुवाद
 
 वह पुरुष जिस तक प्रत्येक जीव को पहुँचना है, उस भगवान् का शाश्वत रूप है, जो ब्रह्म तथा परमात्मा कहलाता है। वह प्रधान दिव्य पुरुष है और उसके कार्यकलाप अध्यात्मिक हैं।
 
तात्पर्य
 जिस पुरुष तक जीव को पहुँचना है उसे विभेदित करने के लिए समस्त जीवों में प्रमुख कहा गया है और यह निराकार ब्रह्मतेज तथा परमात्मा का अन्तिम स्वरूप है। चूँकि वह ब्रह्मतेज तथा परमात्मा का उत्पत्ति स्थान है इसलिए उसे मुख्य पुरुष कहा गया है। कठोपनिषद् में पुष्टि की गई है—नित्यो नित्यानाम्—शाश्वत जीव तो अनेक हैं, किन्तु वह मुख्य पालक है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी हुई है, जहाँ भगवान् कहते हैं—अहं सर्वस्य प्रभव:—“मैं हर वस्तु का मूल हूँ जिसमें ब्रह्मतेज तथा परमात्मा सम्मिलित है।” उनके कार्यकलाप दिव्य हैं, जैसी कि भगवद्गीता से पुष्टि हुई है—जन्म कर्म च मे दिव्यम्—भगवान् के कार्यकलाप तथा उनका प्राकट्य एवं तिरोधान सभी दिव्य हैं। इन्हें भौतिक नहीं मानना चाहिए। जो कोई इस तथ्य को समझता है कि उनके कार्यकलाप, प्राकट्य तथा तिरोधान सारे भौतिक कार्यों या भौतिक अनुभूति से परे हैं वह मुक्त हो जाता है। यो वेत्ति तत्त्वत:; त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म—ऐसा व्यक्ति, अपना शरीर त्यागने पर पुन: इस संसार में नहीं आता, अपितु परम पुरुष के पास चला जाता है। यहाँ पर इसी की पुष्टि है—पुरुष: पुरुषं व्रजेत्—भगवान् की दिव्य प्रकृति तथा उनके कार्यकलापों को समझ लेने से ही जीव भगवान् के पास आता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥