श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते ।
भूतानां महदादीनां यतो भिन्नद‍ृशां भयम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
रूप-भेद—रूपों के परिवर्तन का; आस्पदम्—कारण; दिव्यम्—दिव्य; काल:—काल, समय; इति—इस प्रकार; अभिधीयते—जाना जाता है; भूतानाम्—जीवों का; महत्-आदीनाम्—ब्रह्मा आदि; यत:—जिससे; भिन्न-दृशाम्— पृथक् दृष्टिकोण से; भयम्—डर ।.
 
अनुवाद
 
 विभिन्न भौतिक रूपान्तरों को उत्पन्न करने वाला काल भगवान् का ही एक अन्य स्वरूप है। जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि काल तथा भगवान् एक ही हैं वह काल से भयभीत रहता है।
 
तात्पर्य
 हर कोई काल की गतिविधियों से भयभीत रहता है, किन्तु जो यह जानता है कि काल भगवान् का दूसरा स्वरूप है उसे काल-प्रभाव से तनिक भी भय नहीं होता। रूपभेदास्पदम् पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। काल के प्रभाव से न जाने कितने स्वरूप बदलते रहते हैं। उदाहरणार्थ, जब बच्चा पैदा होता है, तो उसका रूप छोटा होता है, किन्तु कालक्रम से वही रूप बड़े रूप में बदल जाता है—पहले एक बालक के शरीर में और फिर तरुण पुरुष के शरीर में बदल जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु काल द्वारा या भगवान् के अप्रत्यक्ष नियंत्रण द्वारा बदलती रहती है। सामान्यतया हमें एक शिशु, एक बालक या एक तरुण पुरुष के शरीर में अन्तर नहीं दिखता, क्योंकि हमें पता है कि यह काल का प्रभाव है। जो व्यक्ति यह न जानता हो कि काल किस प्रकार क्रिया करता है उसके लिए काल भय का कारण है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥