श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक
न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धव: ।
आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; च—तथा; अस्य—भगवान् का; कश्चित्—कोई; दयित:—प्रिय; न—नहीं; द्वेष्य:—शत्रु; न—नहीं; च— तथा; बान्धव:—मित्र; आविशति—निकट जाता है; अप्रमत्त:—सजग; असौ—वह; प्रमत्तम्—असावधान; जनम्— व्यक्ति को; अन्त-कृत्—विनाशकर्ता ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का न तो कोई प्रिय है, न ही कोई शत्रु या मित्र है। किन्तु जो उन्हें भूले नहीं हैं, उन्हें वे प्रेरणा प्रदान करते हैं और जो उन्हें भूल चुके हैं उनका क्षय करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु के साथ अपने उस सम्बन्ध को भूलना (विस्मृति) ही मनुष्य के जन्म-मृत्यु के चक्र का कारण है। जीव उतना ही सनातन है जितना कि परमेश्वर है, किन्तु जीव अपनी विस्मृति के कारण इस प्रकृति में आता है और एक शरीर से दूसरे में देहान्तर करता है। जब शरीर नष्ट हो जाता है, तो वह सोचता है कि उसका भी नाश हो गया। वास्तव में भगवान् विष्णु के साथ अपने सम्बन्ध की यह विस्मृति ही उसके विनाश का कारण है। जो व्यक्ति मूल सम्बन्ध की स्मृति सजग रखता है, वह भगवान् से प्रेरणा प्राप्त करता है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि भगवान् किसी का शत्रु है और किसी का मित्र है। वह सबों की सहायता करता है और जो भौतिक शक्ति (माया) के प्रभाव से मोहित नहीं होता वह बच जाता है और जो मोहग्रस्त हो जाता है, वह नष्ट हो जाता है। इसीलिए कहा गया है—हरिं विना न मृतिं तरन्ति—परमेश्वर की सहायता के बिना कोई जन्म-मृत्यु के चक्र से बच नहीं सकता। इसलिए सभी जीवों का धर्म है कि वे विष्णु के चरणकमलों की शरण ग्रहण करें और अपने को जन्म- मरण के चक्र से बचा लें।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥