श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
यद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति यद्भयात् ।
यद्भयाद्वर्षते देवो भगणो भाति यद्भयात् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिस (परमेश्वर) के; भयात्—भय से; वाति—बहती है; वात:—वायु; अयम्—यह; सूर्य:—सूर्य; तपति— चमकता है; यत्—जिसके; भयात्—भय से; यत्—जिसके; भयात्—भय से; वर्षते—वर्षा करता है; देव:—वर्षा का देवता; भ-गण:—नक्षत्रों का समूह; भाति—चमकता है; यत्—जिसके; भयात्—भय से ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के ही भय से वायु बहती है, उन्हीं के भय से सूर्य चमकता है, वर्षा का देवता पानी बरसाता है और उन्हीं के भय से नक्षत्रों का समूह चमकता है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् का वचन है—मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते—“प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य करती है।” मूर्ख व्यक्ति सोचता है कि प्रकृति स्वत: कार्यशील है, किन्तु वैदिक साहित्य द्वारा ऐसे अनीश्वरवादी सिद्धान्त की पुष्टि नहीं होती। प्रकृति परमेश्वर की अध्यक्षता में कार्य कर रही है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में हुई है और यहाँ पर भी हम देखते हैं कि भगवान् के ही निर्देशन में सूर्य चमकता है और बादल पानी बरसाता है। सारी प्राकृतिक घटनाएँ भगवान् विष्णु की अध्यक्षता में घटित होती हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥