श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
नभो ददाति श्वसतां पदं यन्नियमादद: ।
लोकं स्वदेहं तनुते महान् सप्तभिरावृतम् ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
नभ:—आकाश; ददाति—देता है; श्वसताम्—जीवों को; पदम्—आवास; यत्—जिस (भगवान्) के; नियमात्— नियन्त्रण में; अद:—वह; लोकम्—ब्रह्माण्ड को; स्व-देहम्—अपने शरीर को; तनुते—विस्तार करता है; महान्— महत् तत्त्व; सप्तभि:—सात (कोशों) सहित; आवृतम्—आच्छादित ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के ही नियन्त्रण में अन्तरक्षि में आकाश सारे लोकों को स्थान देता है जिनमें असंख्य जीव रहते हैं। उन्हीं के नियन्त्रण में ही सकल विराट शरीर अपने सातों कोशों सहित विस्तार करता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से पता चलता है कि बाह्य अन्तरिक्ष में सारे लोक तैर रहे हैं और उन सबों में जीव हैं। श्वसताम् का अर्थ है “जो श्वास लेते हैं” अर्थात् जीवित प्राणी। इन सबको धारण करने के लिए असंख्य लोक हैं। प्रत्येक लोक में अगणित जीव हैं और भगवान् के परम आदेश से आकाश में आवश्यक अन्तरिक्ष है। यहाँ यह भी कहा गया है कि सम्पूर्ण विराट शरीर (पिंड) विस्तार कर रहा है। यह सात कोशों से आवृत है और जिस तरह इस ब्रह्माण्ड में पाँच तत्त्व हैं उसी तरह विराट काय (पिंड) को बाहर से आच्छादित करने वाले कोशों में सारे तत्त्व पाये जाते हैं। ब्रह्माण्ड का पहला स्तर (कोश) पृथ्वी है, जो ब्रह्माण्ड के भीतरी अवकाश से दस गुना अधिक है; दूसरा स्तर जल का है, जो पृथ्वी के स्तर से दस गुना अधिक है। तीसरा स्तर अग्नि का है, जो जल के कोश से दस गुना है। इस तरह प्रत्येक स्तर अपने पूर्ववर्ती स्तर से दस गुना बड़ा है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥