श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.29.5 
लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष-
श्चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये ।
श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया
त्वमाविरासी: किल योगभास्कर: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
लोकस्य—जीवों का; मिथ्या-अभिमते:—अहंकार से मोहग्रस्त; अचक्षुष:—अंधा; चिरम्—दीर्घकाल तक; प्रसुप्तस्य—सोते हुए का; तमसि—अंधकार में; अनाश्रये—आश्रयविहीन; श्रान्तस्य—थके हुए के; कर्मसु—कर्मों के प्रति; अनुविद्धया—संलग्न, अनुरक्त; धिया—बुद्धि से; त्वम्—तुम; आविरासी:—प्रकट हुए हो; किल—निस्सन्देह; योग—योग प्रणाली का; भास्कर:—सूर्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, आप सूर्य के समान हैं, क्योंकि आप जीवों के बद्धजीवन के अन्धकार को प्रकाशित करने वाले हैं। उनके ज्ञान-चक्षु बन्द होने से वे आपके आश्रय के बिना उस अन्धकार में लगातार सुप्त पड़े हुए हैं, फलत: वे अपने कर्मों के कार्य-कारण प्रभाव से झूठे ही व्यस्त रहते हैं और अत्यन्त थके हुए प्रतीत होते हैं।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान् कपिलदेव की महिमामयी माता श्रीमती देवहूति उन सामान्य जनों की दयनीय स्थिति के प्रति अत्यन्त कृपालु हैं, जो जीवन का लक्ष्य न जानते हुए मोह के गहन अन्धकार में सुप्त पड़े हुए हैं। एक वैष्णव या भगवद्भक्त की यह सामान्य भावना होती है कि वह उन्हें जगाए। इसी प्रकार देवहूति अपने यशस्वी पुत्र से बद्धजीवों के जीवन को प्रकाशित करने की प्रार्थना कर रही हैं जिससे उन सबकी अत्यन्त दयनीय जीवन-

दशा का अन्त हो। भगवान् को योगभास्कर अर्थात् समस्त योग पद्धतियों को सूर्यकहा गया है। देवहूति अपने यशस्वी पुत्र से भक्तियोग का वर्णन करने का पहले ही अनुरोध कर चुकी थीं और भगवान् ने भक्तियोग का चरम योग पद्धति के रूप में वर्णन किया है।

भक्तियोग उन बद्धजीवों के उद्धार के लिए सूर्य के प्रकाश तुल्य है, जिनकी सामान्य दशा का यहाँ वर्णन हुआ है। उनके पास अपना हित देख पाने के लिए आँखें नहीं हैं। वे यह नहीं जानते कि जीवन का लक्ष्य भौतिक आवश्यकताओं की वृद्धि करना नहीं हैं, क्योंकि शरीर कुछ वर्षों से अधिक नहीं रह सकता। जीव तो शाश्वत हैं और उनकी आवश्यकताएँ शाश्वत हैं। यदि मनुष्य केवल शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने में लगा रहे और जीवन की शाश्वत आवश्यकताओं की अनदेखी करता चले तो वह उस सभ्यता का अंश होगा जिसकी प्रगति जीवों को अज्ञान के अन्धकारमय क्षेत्र में डाल देती है। उस अन्धकारमय क्षेत्र में रहते हुए उसका किसी प्रकार की नवचेतना नहीं पाता, अपितु वह धीरे-धीरे थकता जाता है। वह इस थकान को दूर करने के लिए अनेक साधन खोजता है, किन्तु असफल होता है और निराश रहा आता है। जीवन-संघर्ष में इस थकान को मिटाने का एकमात्र उपाय भक्तिमार्ग अथवा कृष्णभावनामृत का मार्ग है।

 
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