श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते ।
स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने उत्तर दिया; भक्ति-योग:—भक्ति; बहु-विध:—अनेक प्रकार के; मार्गै:—मार्गों से; भामिनि—हे उत्तम स्त्री; भाव्यते—प्रकट है; स्वभाव—प्रकृति; गुण—गुण; मार्गेण—व्यवहार के अनुसार; पुंसाम्— साधकों के; भाव:—प्राकट्य; विभिद्यते—विभाजित है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कपिल ने उत्तर दिया : हे भामिनि, साधक के विभिन्न गुणों के अनुसार भक्ति के अनेक मार्ग हैं।
 
तात्पर्य
 कृष्णभावनाभावित होकर शुद्ध भक्ति केवल एक है, क्योंकि शुद्धभक्ति में भक्त भगवान् से किसी भी माँग को पूरा करने के लिए नहीं कहता। किन्तु सामान्य रूप से लोग इस प्रयोजन से भक्ति करते हैं। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, जो लोग शुद्ध नहीं हैं, वे चार प्रकार के प्रयोजनों से भक्ति करते हैं। कोई व्यक्ति भौतिक परिस्थितियों से पीडि़त होकर भगवान् का भक्त बनता है और अपना कष्ट दूर करने के लिए भगवान् के पास जाता है। जिस व्यक्ति को धन की कमी होती है वे भगवान् के पास पहुँचकर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए याचना करता हैं। अन्य लोग, जिन्हें कोई कष्ट नहीं है अथवा आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं होती, वे परम सत्य को जानने के लिए ज्ञान की खोज में रहते हैं। वे भी भक्ति स्वीकार करके भगवान् के स्वभाव केविषय में जिज्ञासा करते हैं। भगवद्गीता (७.१६) में इसका सुन्दर वर्णन मिलता है। वस्तुत: भक्तिमार्ग अद्वितीय है, किन्तु भक्तों की परिस्थिति के अनुसार भक्ति अनेक प्रकार की प्रतीत होने लगती है, जिसको अगले श्लोक में उत्तम ढंग से समझाया गया है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥