श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 29: भगवान् कपिल द्वारा भक्ति की व्याख्या  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा ।
अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भाव: स राजस: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
विषयान्—विषय, भोग को; अभिसन्धाय—लक्ष्य करके; यश:—ख्याति; ऐश्वर्यम्—ऐश्वर्य; एव—निस्सन्देह; वा— अथवा; अर्चा-आदौ—विग्रह-पूजन आदि में; अर्चयेत्—पूजा करे; य:—जो; माम्—मुझको; पृथक्-भाव:— भेदभाव रखने वाला, पृथकतावादी; स:—वह; राजस:—रजोगुण में ।.
 
अनुवाद
 
 मन्दिर में एक पृथकतावादी द्वारा भौतिक भोग, यश तथा ऐश्वर्य के प्रयोजन से की जानेवाली विग्रह-पूजा रजोगुणी भक्ति है।
 
तात्पर्य
 ‘पृथकतावादी’ शब्द को सही ढंग से समझना होगा। संस्कृत में इसके लिए भिन्न-दृक् तथा पृथक्-भाव: शब्द मिलते हैं। पृथकतावादी वह है, जो परमेश्वर के हित से अपने हित (स्वार्थ) को पृथक् देखता है। मिश्रित भक्त अथवा रजोगुणी तथा तमोगुणी भक्त सोचते हैं कि भगवान् का स्वार्थ भक्तों के आदेशों की पूर्ति करने में है। ऐसे भक्तों का स्वार्थ इसमें रहता है कि अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए भगवान् से अधिक से अधिक भगवान् से प्राप्त कर लिया जाय। यही पृथकतावादी मानसिकता है। वस्तुत: पिछले अध्याय में शुद्ध भक्ति की व्याख्या हुई है—इसमें भगवान् का मन तथा भक्त के मन को एक दूसरे के अनुसार होना चाहिए। भक्त को केवल भगवान् की इच्छाओं को पूरा करने के सिवाय और कुछ कामना नही करनी चाहिए। यही एकात्मता है। जब भक्त का स्वार्थ परमेश्वर के स्वार्थ से भिन्न होता है, तो उसकी मानसिकता पृथकतावादी जैसी होती है। जब भक्त भगवान् की परवाह किये बिना भौतिक सुख भोगना चाहता है अथवा भगवान् की कृपा का उपयोग करके प्रसिद्ध या ऐश्वर्यवान बनना चाहता है, तो वह रजोगुणी है।

किन्तु मायावादी इस ‘पृथकतावादी’ शब्द की विवेचना भिन्न रूप से करते हैं। उनका कहना है कि भगवान् की पूजा करते समय मनुष्य को अपने आपको परमेश्वर से एक हुआ सोचना चाहिए। प्रकृति के गुणों के अन्तर्गत भक्ति का यह अन्य मिश्रित (भ्रष्ट) रूप है। यह विचार कि जीव परमात्मा से एकाकार है तमोगुण है। वस्तुत: एकत्व या तादात्म्य रुचि (स्वार्थ) के एकत्व पर आधारित है। शुद्ध भक्त का एकमात्र स्वार्थ है परमेश्वर के लिए कर्म करना। जब व्यक्ति का रंचमात्र भी व्यक्तिगत स्वार्थ निहित होता है, तो उसकी भक्ति त्रिगुण से मिश्रित होती है।

 
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