श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
उद्धव उवाच
तत: स आगत्य पुरं स्वपित्रो-
श्चिकीर्षया शं बलदेवसंयुत: ।
निपात्य तुङ्गाद्रिपुयूथनाथं
हतं व्यकर्षद् व्यसुमोजसोर्व्याम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
उद्धव: उवाच—श्रीउद्धव ने कहा; तत:—तत्पश्चात्; स:—भगवान्; आगत्य—आकर; पुरम्—मथुरा नगरी में; स्व-पित्रो:— अपने माता पिता की; चिकीर्षया—चाहते हुए; शम्—कुशलता; बलदेव-संयुत:—बलदेव के साथ; निपात्य—नीचे खींचकर; तुङ्गात्—सिंहासन से; रिपु-यूथ-नाथम्—जनता के शत्रुओं के मुखिया को; हतम्—मार डाला; व्यकर्षत्—खींचा; व्यसुम्— मृत; ओजसा—बल से; उर्व्याम्—पृथ्वी पर ।.
 
अनुवाद
 
 श्री उद्धव ने कहा : तत्पश्चात् भगवान् कृष्ण श्री बलदेव के साथ मथुरा नगरी आये और अपने माता पिता को प्रसन्न करने के लिए जनता के शत्रुओं के अगुवा कंस को उसके सिंहासन से खींच कर अत्यन्त बलपर्वूक भूमि पर घसीटते हुए मार डाला।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर कंस की मृत्यु का संक्षिप्त वर्णन हुआ है, क्योंकि ऐसी लीलाएँ दशम स्कन्ध में स्पष्टता से और विस्तार से वर्णित हैं। भगवान् ने सोलह वर्ष की आयु में ही अपने को माता-पिता का योग्य पुत्र सिद्ध किया। दोनों भाई कृष्ण तथा भगवान् बलराम वृन्दावन से मथुरा गये और उन्होंने अपने मामा कंस का वध किया जिसने उनके माता-पिता वसुदेव तथा देवकी को अत्यधिक कष्ट दे रखा था। कंस एक विराट दैत्य था और वसुदेव एवं देवकी ने कभी सोचा भी नहीं था कि कृष्ण तथा बलराम (बलदेव) इतने बड़े तथा बलवान शत्रु का संहार कर सकेंगे। जब दोनों भाइयों ने सिंहासनारूढ़ कंस पर आक्रमण किया, तो उनके माता पिता डर गये कि अब कंस को हमारे उन पुत्रों को मार डालने का अवसर प्राप्त हो जाएगा, जिन्हें हमने इतने दीर्घकाल तक नन्द महाराज के घर में छिपा रखा था। भगवान् के माता-पिता संतति के प्रति स्नेहवश अत्यधिक त्रास का अनुभव कर रहे थे और वे मूर्छित से हो गये थे। उन्हीं को आश्वस्त करने के लिए ही कृष्ण तथा बलराम ने कंस को मारा और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए ही उसके मृत शरीर को धरती पर घसीटा।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥