श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
कालमागधशाल्वादीननीकै रुन्धत: पुरम् ।
अजीघनत्स्वयं दिव्यं स्वपुंसां तेज आदिशत् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
काल—कालयवन; मागध—मगध का राजा (जरासन्ध); शाल्व—शाल्व राजा; आदीन्—इत्यादि; अनीकै:—सैनिकों से; रुन्धत:—घिरा हुआ; पुरम्—मथुरा नगरी; अजीघनत्—मार डाला; स्वयम्—स्वयं; दिव्यम्—दिव्य; स्व-पुंसाम्—अपने ही लोगों को; तेज:—तेज; आदिशत्—प्रकट किया ।.
 
अनुवाद
 
 कालयवन, मगध के राजा तथा शाल्व ने मथुरा नगरी पर आक्रमण किया, किन्तु जब नगरी उनके सैनिकों से घिर गई तो भगवान् ने अपने जनों की शक्ति प्रदर्शित करने के उद्देश्य से उन सबों को स्वयम् नहीं मारा।
 
तात्पर्य
 कंस की मृत्यु के बाद जब मथुरा नगरी कालयवन, जरासन्ध तथा शाल्व के सैनिकों द्वारा घेर ली गई तो भगवान् इस नगरी से एक तरह से भाग निकले और इस तरह वे रणछोड़ अर्थात् वह जो युद्ध से भाग जाये- कहलाते हैं। वस्तुत: तथ्य यह है कि भगवान् उन सबों को अपने-जनों से अर्थात् मुचुकुंद तथा भीम जैसे भक्तों से, मरवाना चाहते थे। कालयवन तथा मगधराज का वध क्रमश: मुचुकुंद तथा भीम द्वारा किया गया जिन्होंने भगवान् के प्रतिनिधि (एजेन्ट) की भूमिका निभाई। ऐसे कार्यों द्वारा भगवान् अपने भक्तों के पराक्रम (तेज) को प्रदर्शित कराना चाहते थे मानो वे स्वयं उनसे युद्ध करने में असमर्थ हों, परन्तु उनके भक्त उन लोगों का वध कर सकते थे। भगवान् का अपने भक्तों के साथ जो सम्बन्ध है, वह अत्यन्त सुखद है। वस्तुत: भगवान् संसार के अवांछित तत्त्वों का वध करने के लिए ब्रह्मा के अनुरोध पर अवतरित हुए थे, किन्तु यश का श्रेय विभाजित करने के उद्देश्य से उन्होंने कभी- कभी यह श्रेय दिलाने के लिए अपने भक्तों को लगाया। कुरुक्षेत्र का युद्ध स्वयं भगवान् द्वारा नियोजित था, किन्तु अपने भक्त अर्जुन को श्रेय देने के लिए (निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्), उन्होंने सारथी की भूमिका निभाई और अर्जुन को योद्धा की भूमिका निभाने का अवसर प्रदान किया। इस तरह अर्जुन कुरुक्षेत्र युद्ध के नायक बने। कृष्ण अपनी दिव्य योजनाओं द्वारा जो कुछ स्वयं करना चाहते हैं उसे वे अपने विश्वस्त भक्तों के माध्यम से सम्पन्न कराते हैं। अपने शुद्ध अनन्य भक्तों के प्रति भगवान् की कृपा की यही रीति है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥