श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
मिथो यदैषां भविता विवादो
मध्वामदाताम्रविलोचनानाम् ।
नैषां वधोपाय इयानतोऽन्यो
मय्युद्यतेऽन्तर्दधते स्वयं स्म ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
मिथ:—परस्पर; यदा—जब; एषाम्—उनके; भविता—होगा; विवाद:—झगड़ा; मधु-आमद—शराब पीने से उत्पन्न नशा; आताम्र-विलोचनानाम्—ताँबे जैसी लाल आँखों के; न—नहीं; एषाम्—उनके; वध-उपाय:—लोप का साधन; इयान्—इस जैसा; अत:—इसके अतिरिक्त; अन्य:—वैकल्पिक; मयि—मुझ पर; उद्यते—लोप; अन्त:-दधते—विलुप्त होंगे; स्वयम्—अपने से; स्म—निश्चय है ।.
 
अनुवाद
 
 जब वे नशे में चूर होकर, मधु-पान के कारण ताँबें जैसी लाल-लाल आँखें किये, परस्पर लड़ेंगे-झगड़ेंगे तभी वे विलुप्त होंगे अन्यथा यह सम्भव नहीं है। मेरे अन्तर्धान होने पर यह घटना घटेगी।
 
तात्पर्य
 भगवान् तथा उनके संगी भगवान् की इच्छा से प्रकट तथा अप्रकट होते हैं। उन पर भौतिक प्रकृति के नियम लागू नहीं होते। भगवान् के परिवार का वध कर सकने में कोई भी समर्थ न था, न ही प्रकृति के नियमों द्वारा उनकी स्वाभाविक मृत्यु की सम्भावना थी। इसलिए उनके विलोप का एकमात्र साधन था कि वे परस्पर छद्म युद्ध करें मानो मदिरा पीकर वे उन्मत्त हो रहे हों। यह तथाकथित युद्ध भी भगवान् की इच्छा से हो सकता था अन्यथा उन सबके लडऩे का कोई कारण नहीं था। जिस तरह अर्जुन पारिवारिक स्नेह के कारण मोहित हो उठा था और तब उससे भगवद्गीता कही गई थी उसी तरह यदुवंश को
भगवान् की इच्छा से ही मदोन्मत्त बनाया गया था। इससे अधिक कुछ नहीं था। भगवान् के भक्त तथा संगी पूर्णतया शरणागत आत्माएँ हैं। अतएव वे भगवान् के हाथों में दिव्य साधन हैं और भगवान् जैसा चाहें उनका उपयोग हो सकता है। शुद्ध भक्त भी भगवान् की ऐसी लीलाओं का आनन्द लेते हैं, क्योंकि वे भगवान् को प्रसन्न देखना चाहते हैं। भगवान् के भक्त कभी भी स्वतंत्र व्यक्तित्व पर बल नहीं देते, उल्टे वे अपनी वैयक्तिकता का उपयोग भगवान् की इच्छाओं को पूरा करने में करते हैं। भगवान् के साथ भक्तों का यह सहयोग भगवान् की लीलाओं को पूर्णता प्रदान करता है।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥