श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
एवं सञ्चिन्त्य भगवान् स्वराज्ये स्थाप्य धर्मजम् ।
नन्दयामास सुहृद: साधूनां वर्त्म दर्शयन् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; सञ्चिन्त्य—अपने मन में सोचकर; भगवान्—भगवान् ने; स्व-राज्ये—अपने राज्य में; स्थाप्य—स्थापित करके; धर्मजम्—महाराज युधिष्ठिर को; नन्दयाम् आस—हर्षित किया; सुहृद:—मित्र गणों; साधूनाम्—सन्तों के; वर्त्म—मार्ग; दर्शयन्—दिखलाते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह अपने आप सोचते हुए भगवान् कृष्ण ने पुण्य के मार्ग में प्रशासन का आदर्श प्रदर्शित करने के लिए संसार के परम नियन्ता के पद पर महाराज युधिष्ठिर को स्थापित किया।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥