श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
उत्तरायां धृत: पूरोर्वंश: साध्वभिमन्युना ।
स वै द्रौण्यस्त्रसंप्लुष्ट: पुनर्भगवता धृत: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
उत्तरायाम्—उत्तरा के; धृत:—स्थापित; पूरो:—पूरु का; वंश:—उत्तराधिकारी; साधु-अभिमन्युना—वीर अभिमन्यु द्वारा; स:— वह; वै—निश्चय ही; द्रौणि-अस्त्र—द्रोण के पुत्र द्रौणि के हथियार द्वारा; सम्प्लुष्ट:—जलाया जाकर; पुन:—दुबारा; भगवता— भगवान् द्वारा; धृत:—बचाया गया था ।.
 
अनुवाद
 
 महान् वीर अभिमन्यु द्वारा अपनी पत्नी उत्तरा के गर्भ में स्थापित पूरु के वंशज का भ्रूण द्रोण के पुत्र के अस्त्र द्वारा भस्म कर दिया गया था, किन्तु बाद में भगवान् ने उसकी पुन: रक्षा की।
 
तात्पर्य
 महान् वीर अभिमन्यु से उत्तरा द्वारा गर्भधारण करने के बाद जब परीक्षित का शरीर भ्रूणावस्था में था, तो अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र द्वारा वह भस्म कर दिया गया था, किन्तु भगवान् ने गर्भ के भीतर दूसरा शरीर प्रदान किया। इस तरह पूरु का वंशज बचा लिया गया। यह घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि शरीर तथा जीव अर्थात् आध्यात्मिक स्फुलिंग भिन्न-भिन्न हैं। जब पुरुष के वीर्य के प्रवेश से स्त्री के गर्भ में जीव आश्रय पाता है, तो पुरुष तथा स्त्री के स्रावों का मिश्रण होता है, जिससे मटर के आकार का शरीर निर्मित होता है, जो धीरे-धीरे बढक़र पूर्ण शरीर में विकसित हो जाता है। किन्तु यदि किसी तरह यह भ्रूण नष्ट कर दिया जाता है, तो जीव को दूसरे शरीर में या दूसरी स्त्री के गर्भ में आश्रय लेना पड़ता है। वह विशिष्ट जीव, जिसे महाराज पूरु या पाण्डवों का वंशज बनने के लिए चुना गया था, कोई सामान्य जीव न था और भगवान् की महती इच्छा से उसे महाराज युधिष्ठिर का उत्तराधिकारी होना था। अतएव जब अश्वत्थामा ने महाराज परीक्षित के भ्रूण को विनष्ट कर दिया तो भगवान् अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा अपने स्वांश से उत्तरा के गर्भ में भावी एवं संकटग्रस्त महाराज परीक्षित को दर्शन देने के लिए प्रविष्ट हुए। गर्भ के भीतर अपने प्राकट्य से भगवान् ने शिशु को प्रोत्साहित किया और अपनी सर्वशक्तिमत्ता से नवीन शरीर में उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान की। वे अपनी सर्वव्यापकता की शक्ति से उत्तरा तथा पाण्डव परिवार के अन्य जनों के भीतर तथा बाहर उपस्थित थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥