श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुग: ।
कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्त: सांख्यमास्थित: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान्; अपि—भी; विश्व-आत्मा—ब्रह्माण्ड के परमात्मा; लोक—लोक व्यवहार; वेद—वैदिक सिद्धान्त; पथ- अनुग:—मार्ग का अनुकरण करने वाला; कामान्—जीवन की आवश्यकताएँ; सिषेवे—भोग किया; द्वार्वत्याम्—द्वारकापुरी में; असक्त:—बिना आसक्त हुए; साङ्ख्यम्—सांख्य दर्शन के ज्ञान में; आस्थित:—स्थित होकर ।.
 
अनुवाद
 
 उसी के साथ-साथ भगवान् ने समाज के वैदिक रीति-रिवाजों का दृढ़ता से पालन करते हुए द्वारकापुरी में जीवन का भोग किया। वे सांख्य दर्शन प्रणाली के द्वारा प्रतिपादित वैराग्य तथा ज्ञान में स्थित थे।
 
तात्पर्य
 जब महाराज युधिष्ठिर पृथ्वी के सम्राट थे तो श्रीकृष्ण द्वारका के राजा थे और द्वारकाधीश कहलाते थे। अन्य अधीन राजाओं की तरह वे भी महाराज युधिष्ठिर के शासन के अधीन थे। यद्यपि भगवान् कृष्ण सम्पूर्ण सृष्टि के परम सम्राट हैं, किन्तु जब तक वे धराधाम में रहे उन्होंने कभी भी वैदिक आदेशों का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि ये मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक होते हैं। सांख्य दर्शन नामक ज्ञान-प्रणाली पर आधारित वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार नियमित मानव जीवन ही जीवन की आवश्यकताओं का भोग करने का असली मार्ग है। वैराग्य तथा लोक-व्यवहार के ऐसे ज्ञान के अभाव में तथाकथित मानव सभ्यता खाने, पीने तथा भोगविलास करने वाले पशु-समाज के तुल्य है। भगवान् अपनी इच्छानुसार स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे थे; फिर भी उन्होंने अपने व्यावहारिक दृष्टान्त द्वारा ऐसा जीवन बिताने की शिक्षा दी जो वैराग्य तथा ज्ञान के सिद्धान्तों के विरुद्ध न हो। ज्ञान तथा वैराग्य की प्राप्ति जीवन की वास्तविक पूर्णता है जैसाकि सांख्य दर्शन में विस्तारपूर्वक प्रतिपादित किया गया है। ज्ञान का अर्थ होता है यह जानना कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य संसार के सारे कष्टों को समाप्त करना है और शारीरिक आवश्यकताओं की नियमित रूप से पूर्ति करने के बावजूद मनुष्य का ऐसे पाशविक जीवन से विरक्त होना है। शरीर की माँगों की पूर्ति करना पाशविक जीवन है और आत्मा के उद्देश्य की पूर्ति करना मानव उद्देश्य है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥