श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
सान्दीपने: सकृत्प्रोक्तं ब्रह्माधीत्य सविस्तरम् ।
तस्मै प्रादाद्वरं पुत्रं मृतं पञ्चजनोदरात् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
सान्दीपने:—सान्दीपनि मुनि के; सकृत्—केवल एक बार; प्रोक्तम्—कहा गया; ब्रह्म—ज्ञान की विभिन्न शाखाओं समेत सारे वेद; अधीत्य—अध्ययन करके; स-विस्तरम्—विस्तार सहित; तस्मै—उसको; प्रादात्—दिया; वरम्—वरदान; पुत्रम्—उसके पुत्र का; मृतम्—मरे हुए; पञ्च-जन—मृतात्माओं का क्षेत्र; उदरात्—के भीतर से ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने अपने शिक्षक सान्दीपनि मुनि से केवल एक बार सुनकर सारे वेदों को उनकी विभिन्न शाखाओं समेत सीखा और गुरुदक्षिणा के रूप में अपने शिक्षक के मृत पुत्र को यमलोक से वापस लाकर दे दिया।
 
तात्पर्य
 एकमात्र कृष्ण ऐसे हैं, जो अपने गुरु के मुख से एक बार सुन कर ही वैदिक विद्या की समस्त शाखाओं में पारंगत हो सकते हैं। यमराज के क्षेत्र में आत्मा के चले जाने पर कोई व्यक्ति मृत शरीर को जीवित नहीं कर सकता है। किन्तु भगवान् कृष्ण ने यमलोक तक जाने का साहस किया और अपने गुरु के मृतपुत्र को ढूँढा तथा उसे वापस लाकर उनसे प्राप्त शिक्षा के लिए गुरुदक्षिणा के रूप में सौंप दिया। भगवान् स्वभावत: सारे वेदों में सिद्धहस्त हैं, किन्तु सबों के समक्ष यह दृष्टान्त प्रस्तुत करने के लिए कि प्रामाणिक गुरु से वेदों का अध्ययन करना चाहिए और सेवा तथा दक्षिणा द्वारा गुरु को प्रसन्न करना चाहिए, उन्होंने स्वयं इस पद्धति को अपनाया। भगवान् ने अपने गुरु सान्दीपनि मुनि की सेवा की और भगवान् की शक्ति को समझ करके ही मुनि ने ऐसी वस्तु माँगी जिसे पूरा कर पाना अन्य किसी के लिए असम्भव था। गुरु ने कहा कि उसका मृत पुत्र लाकर के उसे दिया जाय और भगवान् ने उनके इस आग्रह को पूरा किया। अतएव भगवान् अपने प्रति किसी भी प्रकार की सेवा करने वाले के प्रति कृतघ्न नहीं हैं। भगवान् के वे भक्त जो सदैव उनकी प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहते हैं कभी भी भक्ति के प्रगतिशील प्रयाण में निराश नहीं होते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥