श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
तस्यैवं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।
गृहमेधेषु योगेषु विराग: समजायत ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका; एवम्—इस प्रकार; रममाणस्य—रमण करने वाले; संवत्सर—वर्षों; गणान्—अनेक; बहून्—कई; गृहमेधेषु— गृहस्थ जीवन में; योगेषु—यौन जीवन में; विराग:—विरक्ति; समजायत—जागृत हुई ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह भगवान् अनेकानेक वर्षों तक गृहस्थ जीवन में लगे रहे, किन्तु अन्त में नश्वर यौन जीवन से उनकी विरक्ति पूर्णतया प्रकट हुई।
 
तात्पर्य
 यद्यपि भगवान् कभी भी किसी प्रकार के भौतिक यौन जीवन में लिप्त नहीं होते, किन्तु जगद्गुरु के रूप में दूसरों को यह शिक्षा देने के लिए कि किस तरह गृहस्थ जीवन बिताना चाहिए वे स्वयं अनेकानेक वर्षों तक गृहस्थ बने रहे। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बतलाते हैं कि समजायत शब्द का अर्थ “पूर्णतया प्रकट किया” है। जब तक वे पृथ्वी पर उपस्थित रहे भगवान् ने अपने सारे कार्यों में विरक्ति प्रदर्शित की। इसका पूर्ण प्रदर्शन तब हुआ जब उन्होंने दृष्टान्त द्वारा यह शिक्षा देनी चाही कि मनुष्य को अपने सम्पूर्ण जीवनभर गृहस्थ जीवन में आसक्त नहीं रहना चाहिए। मनुष्य को स्वभावत: विरक्ति उत्पन्न करनी चाहिए। भगवान् द्वारा गृहस्थ जीवन से विरक्ति यह नहीं सूचित करती कि उन्होंने अपने नित्य संगियों, दिव्य गोपियों से विरक्ति ले ली थी। किन्तु भगवान् प्रकृति के तीन गुणों के प्रति अपनी तथाकथित आसक्ति को समाप्त करना चाहते थे। वे अपने दिव्य संगियों यथा रुक्मिणी तथा लक्ष्मियों की सेवा से कभी भी विरक्त नहीं हो सकते जैसाकि ब्रह्म-संहिता (५.२९) में वर्णन हुआ है—लक्ष्मीसहस्र शत सम्भ्रमसेव्यमानम्।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥