श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
तत: कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादय: ।
ययु: प्रभासं संहृष्टा रथैर्देवविमोहिता: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; कतिपयै:—कुछेक; मासै:—मास बिता कर; वृष्णि—वृष्णि के वंशज; भोज—भोज के वंशज; अन्धक- आदय:—अन्धक के पुत्र इत्यादि; ययु:—गये; प्रभासम्—प्रभास नामक तीर्थस्थान; संहृष्टा:—अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; रथै:— अपने अपने रथों पर; देव—कृष्ण द्वारा; विमोहिता:—मोहग्रस्त ।.
 
अनुवाद
 
 कुछेक महीने बीत गये तब कृष्ण द्वारा विमोहित हुए समस्त वृष्णि, भोज तथा अन्धक वंशी, जो कि देवताओं के अवतार थे, प्रभास गये। किन्तु जो भगवान् के नित्य भक्त थे वे द्वारका में ही रहते रहे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥