श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्त्वा भगवदर्पणम् ।
गोविप्रार्थासव: शूरा: प्रणेमुर्भुवि मूर्धभि: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
अन्नम्—खाद्यवस्तुएँ; च—भी; उरु-रसम्—अत्यन्त स्वादिष्ट; तेभ्य:—ब्राह्मणों को; दत्त्वा—देकर; भगवत्-अर्पणम्—जिन्हें सर्वप्रथम भगवान् को अर्पित किया गया; गो—गौवें; विप्र—ब्राह्मण; अर्थ—प्रयोजन, उद्देश्य; असव:—जीवन का प्रयोजन; शूरा:—सारे बहादुर क्षत्रिय; प्रणेमु:—प्रणाम किया; भुवि—भूमि छूकर; मूर्धभि:—अपने सिरों से ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् उन्होंने सर्वप्रथम भगवान् को अर्पित किया गया अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन उन ब्राह्मणों को भेंट किया और तब अपने सिरों से भूमि का स्पर्श करते हुए उन्हें सादर नमस्कार किया। वे गौवों तथा ब्राह्मणों की रक्षा करते हुए भलीभाँति रहने लगे।
 
तात्पर्य
 प्रभास तीर्थस्थल में यदुवंशियों द्वारा प्रदर्शित आचरण सुसंस्कृत तथा मानवसिद्धि के सर्वथा अनुरूप था। मानव जीवन की सिद्धि सभ्यता के निम्नलिखित तीन सिद्धान्तों द्वारा प्राप्त की जाती है। ये हैं; गौवों की रक्षा करना, ब्राह्मण संस्कृति को बनाये रखना तथा सर्वोपरि है भगवद्भक्त बनना। भगवद्भक्त बने बिना कोई मनुष्य अपने मानव जीवन को पूर्ण नहीं बना सकता। मानव जीवन की पूर्णता आध्यात्मिक जगत तक ऊपर उठना है जहाँ न जन्म है, न मृत्यु है, न रोग, न वृद्धावस्था। मानव जीवन का परम उद्देश्य यही सर्वोच्च सिद्धि है। इस उद्देश्य के बिना तथाकथित सुख सुविधाओं में कोई कितनी ही उन्नति क्यों न करे, उससे मनुष्य जीवन की पराजय ही होती है।
ब्राह्मण तथा वैष्णवजन ऐसी कोई खाद्य वस्तु स्वीकार नहीं करते जो पहले से भगवान् को अर्पित न की जा चुकी हो। भगवान् को अर्पित भोज्य वस्तु भक्तों द्वारा भगवत्कृपा के रूप में स्वीकार की जाती है। आखिर, भगवान् ही सब प्रकार का भोज्य पदार्थ मनुष्यों तथा पशुओं को प्रदान करते हैं। मनुष्य को इस तथ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए कि समस्त खाद्य पदार्थ, यथा अन्न, शाक, दूध, जल इत्यादि, जो कि जीवन की मुख्य आवश्यकताएँ हैं, भगवान् द्वारा मनुष्य को प्रदान की जाती हैं। उन्हें न तो किसी विज्ञानी द्वारा या भौतिकतावादी द्वारा मानवप्रयास से स्थापित की गई प्रयोगशाला या फैक्टरी में तैयार किया जा सकता है। बुद्धिमान श्रेणी के लोग ब्राह्मण कहलाते हैं और जिन्होंने परब्रह्म के परम साकार रूप में उनका साक्षात्कार किया है वे वैष्णव कहलाते हैं। किन्तु दोनों ही यज्ञ के उच्छिष्ट को भोज्य पदार्थ के रूप में ग्रहण करते हैं। यज्ञ अन्तत: यज्ञ पुरुष विष्णु को तुष्ट करने के निमित्त हैं। भगवद्गीता (३.१३) में कहा गया है कि जो यज्ञ-उच्छिष्ट को भोज्य पदार्थ के रूप में ग्रहण करता है, वह समस्त पापों से छूट जाता है और जो अपने शरीर के पालन-पोषण के लिए भोजन बनाता है, वह सभी तरह के कष्टप्रद पाप ग्रहण करता है। प्रभास तीर्थस्थान में प्रामाणिक ब्राह्मणों को भेंट देने के लिए यदुओं ने जो भोज्य पदार्थ तैयार कराये थे वे सभी भगवान् विष्णु को अर्पित किये गये थे। यदुओं ने अपने सिरों से भूमि का स्पर्श करते हुए सादर नमस्कार किया। वैदिक संस्कृति में चाहे यदुगण हों या अन्य कोई प्रबुद्ध परिवार, उन्हें विभिन्न वर्णों के मध्य सेवा के पूर्ण सहयोग द्वारा मानव-सिद्धि प्राप्ति के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है।

उरु-रसम् शब्द भी यहाँ पर महत्त्वपूर्ण है। अन्न, शाक तथा दूध को मिलाकर सैकड़ों प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किये जा सकते हैं। ऐसे समस्त व्यञ्जन सात्विक होते हैं, अतएव इन्हें भगवान् को अर्पित किया जा सकता है। जैसाकि भगवद्गीता (३.१३) में कहा गया है कि भगवान् केवल फल, फूल, पत्ती तथा तरल पदार्थों से तैयार भोज्य पदार्थों को ही स्वीकार करते हैं, बशर्ते कि वे पूर्ण भक्ति के साथ अर्पित किये जाँय। भक्ति ही भगवान् को प्रामाणिक भेंट की एकमात्र कसौटी है। भगवान् आश्वासन देते हैं कि भक्तों द्वारा अर्पित ऐसे भोज्य पदार्थ वे अवश्य खाते हैं। इस तरह सभी दृष्टियों से निर्णय करने पर यदुगण पूर्णरूपेण प्रशिक्षित सभ्य पुरुष थे और ब्राह्मण मुनियों द्वारा उनका शापित होना एकमात्र भगवान् की इच्छा के फलस्वरूप था। यह समूची घटना समस्त सम्बद्ध लोगों के लिए चेतावनी थी कि ब्राह्मणों तथा वैष्णवों के साथ किसी को अनुचित व्यवहार नहीं करना चाहिए।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध के अन्तर्गत “वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ” नामक तीसरे अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥