श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 4

 
श्लोक
ककुद्मिनोऽविद्धनसो दमित्वा
स्वयंवरे नाग्नजितीमुवाह ।
तद्भग्नमानानपि गृध्यतोऽज्ञा-
ञ्जघ्नेऽक्षत: शस्त्रभृत: स्वशस्त्रै: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
ककुद्मिन:—बैल जिनकी नाकें छिदी हुई नहीं थीं; अविद्ध-नस:—नाकें छिदी हुई; दमित्वा—दमन करके; स्वयंवरे—दुलहिन चुनने के लिए खुली स्पर्धा में; नाग्नजितीम्—राजकुमारी नाग्नजिती को; उवाह—ब्याहा; तत्-भग्नमानान्—इस तरह निराश हुओं को; अपि—यद्यपि; गृध्यत:—चाहा; अज्ञान्—मूर्खजन; जघ्ने—मारा तथा घायल किया; अक्षत:—बिना घायल हुऐ; शस्त्र-भृत:—सभी हथियारों से लैस; स्व-शस्त्रै:—अपने हथियारों से ।.
 
अनुवाद
 
 बिना नथ वाले सात बैलों का दमन करके भगवान् ने स्वयंवर की खुली स्पर्धा में राजकुमारी नाग्नजिती का हाथ प्राप्त किया। यद्यपि भगवान् विजयी हुए, किन्तु उनके प्रत्याशियों ने राजकुमारी का हाथ चाहा, अत: युद्ध हुआ। अत: शस्त्रों से अच्छी तरह लैस, भगवान् ने उन सबों को मार डाला या घायल कर दिया, परन्तु स्वयं उन्हें कोई चोट नहीं आई।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥