श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
प्रियं प्रभुर्ग्राम्य इव प्रियाया
विधित्सुरार्च्छद् द्युतरुं यदर्थे ।
वज्र्याद्रवत्तं सगणो रुषान्ध:
क्रीडामृगो नूनमयं वधूनाम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रियम्—प्रिय पत्नी के; प्रभु:—स्वामी; ग्राम्य:—सामान्य जीव; इव—सदृश; प्रियाया:—प्रसन्न करने के लिए; विधित्सु:— चाहते हुए; आर्च्छत्—ले आये; द्युतरुम्—पारिजात पुष्प का वृक्ष; यत्—जिसके; अर्थे—विषय में; वज्री—स्वर्ग का राजा इन्द्र; आद्रवत् तम्—उससे लडऩे आया; स-गण:—दलबल सहित; रुषा—क्रोध में; अन्ध:—अन्धा; क्रीडा-मृग:—कठपुतली; नूनम्—निस्सन्देह; अयम्—यह; वधूनाम्—स्त्रियों का ।.
 
अनुवाद
 
 अपनी प्रिय पत्नी को प्रसन्न करने के लिए भगवान् स्वर्ग से पारिजात वृक्ष ले आये जिस तरह कि एक सामान्य पति करता है। किन्तु स्वर्ग के राजा इन्द्र ने अपनी पत्नियों के उकसाने पर (क्योंकि वह स्त्रीवश्य था) लडऩे के लिए दलबल सहित भगवान् का पीछा किया।
 
तात्पर्य
 एक बार जब भगवान् देवताओं की माता अदिति को कान के कुण्डल भेंट करने स्वर्गलोक गये तो उनकी पत्नी सत्यभामा भी उनके साथ गई थीं। पारिजात नामक एक विशेष पुष्प वृक्ष केवल स्वर्ग में ही उगता है। सत्यभामा ने इस वृक्ष को लेने की इच्छा प्रकट की। भगवान् अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए सामान्य पति की तरह वह वृक्ष अपने साथ ले आये। इससे वज्री अर्थात् वज्र का नियन्ता इन्द्र कुपित हो उठा। इन्द्र की पत्नियों ने उसे युद्ध करने के लिए भगवान् का पीछा करने को उकसाया। चूँकि इन्द्र स्त्रीवश्य पति था और मूर्ख भी था, अत: वह उनके कहने में आ गया और उसने कृष्ण से युद्ध करने का दुस्साहस किया। वह इस अवसर पर मूर्ख बना, क्योंकि वह भूल गया कि प्रत्येक वस्तु भगवान् की है।

यद्यपि भगवान् स्वर्गलोक से वृक्ष ले आये थे, किन्तु इसमें उनका कोई दोष नहीं था। फिर भी शची जैसी सुन्दर पत्नियों का वशीभूत इन्द्र, स्त्रीवश्य होने से, मूर्ख बना जिस तरह स्त्री के वश में रहने वाले सामान्य व्यक्ति मूर्ख होते हैं। इन्द्र ने सोचा कि कृष्ण स्त्रीवश्य पति हैं जिसने अपनी पत्नी सत्यभामा की इच्छा मात्र से स्वर्ग की सम्पत्ति का हरण किया है, अत: उसने कृष्ण को दण्ड देने की सोची। वह यह भूल गया कि भगवान् प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं, और वे स्त्रीवश्य नहीं हो सकते। भगवान् पूर्णतया स्वतंत्र हैं, और इच्छा मात्र से वे सत्यभामा जैसी हजारों पत्नियाँ पा सकते हैं। अत: वे सत्यभामा पर इसलिए अनुरक्त नहीं थे कि वह सुन्दर पत्नी थी, अपितु वे उसकी भक्ति से प्रसन्न थे, अत: वे अपने भक्त की शुद्ध भक्ति का प्रतिदान देना चाह रहे थे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥