श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 3: वृन्दावन से बाहर भगवान् की लीलाएँ  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
तत्राहृतास्ता नरदेवकन्या:
कुजेन दृष्ट्वा हरिमार्तबन्धुम् ।
उत्थाय सद्यो जगृहु: प्रहर्ष-
व्रीडानुरागप्रहितावलोकै: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—नरकासुर के घर के भीतर; आहृता:—अपहृत, भगाई हुई; ता:—उन सबों को; नर-देव-कन्या:—अनेक राजाओं की पुत्रियों को; कुजेन—असुर द्वारा; दृष्ट्वा—देखकर; हरिम्—भगवान् को; आर्त-बन्धुम्—दुखियारों के मित्र; उत्थाय—उठकर; सद्य:—वहीं पर, तत्काल; जगृहु:—स्वीकार किया; प्रहर्ष—हँसी खुशी के साथ; व्रीड—लज्जा; अनुराग—आसक्ति; प्रहित- अवलोकै:—उत्सुक चितवनों से ।.
 
अनुवाद
 
 उस असुर के घर में नरकासुर द्वारा हरण की गई सारी राजकुमारियाँ दुखियारों के मित्र भगवान् को देखते ही चौकन्नी हो उठीं। उन्होंने अतीव उत्सुकता, हर्ष तथा लज्जा से भगवान की ओर देखा और अपने को उनकी पत्नियों के रूप में अर्पित कर दिया।
 
तात्पर्य
 नरकासुर ने बड़े-बड़े राजाओं की अनेक पुत्रियों का अपरहण किया था और उन्हें अपने राजमहल में बन्दी बनाकर रखा था। किन्तु जब वह भगवान् द्वारा मार डाला गया और जब भगवान् उस असुर के घर में प्रविष्ट हुए तो सारी राजकुमारियाँ हर्ष से प्रफुल्लित हो उठीं और उन्होंने उनकी पत्नियाँ बनने के लिए स्वयं को अर्पित कर दिया, क्योंकि भगवान् ही दुखियारों के एकमात्र मित्र हैं। यदि भगवान् उन्हें स्वीकार नहीं करते तो उन सबों के विवाहित होने की कोई सम्भावना नहीं थी, क्योंकि उस असुर ने उनको उनके पिता के संरक्षण से अपहरण किया था, अत: कोई भी व्यक्ति उनसे विवाह करने के लिए राजी न होता। वैदिक समाज की रीति के अनुसार कन्याएँ पिता के संरक्षण से पति के संरक्षण में भेजी जाती हैं। चूँकि ये कन्याएँ पहले ही अपने-अपने पिता के संरक्षण से अपहृत की जा चुकी थीं, अतएव भगवान् के अतिरिक्त उनके लिए अन्य कोई पति प्राप्त कर पाना असम्भव होता।
 
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