श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
अर्थैरापादितैर्गुर्व्या हिंसयेतस्ततश्च तान् ।
पुष्णाति येषां पोषेण शेषभुग्यात्यध: स्वयम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
अर्थै:—सम्पत्ति से; आपादितै:—अर्जित; गुर्व्या—महान्; हिंसया—हिंसा से; इत:-तत:—इधर-उधर; च—तथा; तान्—उनको (परिजनों को); पुष्णाति—पालन करता है; येषाम्—जिनके; पोषेण—पालन से; शेष—बचा हुआ; भुक्—भोजन; याति—जाता है; अध:—नीचे की ओर; स्वयम्—स्वयं ।.
 
अनुवाद
 
 वह इधर-उधर हिंसा करके धन प्राप्त करता है और यद्यपि वह इसे अपने परिवार के भरण-पोषण में लगाता है, किन्तु स्वयं इस प्रकार से खरीदे भोजन का अल्पांश ही ग्रहण करता है। इस तरह वह उन लोगों के लिए नरक जाता है, जिनके लिए उसने अवैध ढंग से धन कमाया था।
 
तात्पर्य
 एक बँगाली कहावत है, “जिस व्यक्ति के लिए मैंने चोरी की वही मुझे चोर कहता है।” जिन पारिवारिक सदस्यों के लिए मनुष्य अनेक पापकर्म करता है वे उससे कभी प्रसन्न नहीं रहते। मोहवश अनुरक्त व्यक्ति ऐसे पारिवारिक सदस्यों की सेवा करता है, किन्तु इनकी सेवा से उसे जीवन की नारकीय अवस्था में प्रवेश करना होता है। उदाहरणार्थ, कोई चोर अपने परिवार के पालन हेतु कोई वस्तु चुराता है, किन्तु पकड़ा वही जाता है और बन्दी बना लिया जाता है। यही सार है इस जगत का और समाज, मैत्री तथा प्रेम के प्रति आसक्ति का। यद्यपि एक आसक्त पारिवारिक व्यक्ति अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए किसी न किसी तरह से धन कमाने में लगा रहता है, किन्तु वह उतने से अधिक का भोग नहीं कर पाता जितना कि ऐसे पापकर्म किये बिना वह करता। आठ औंस (१ पाव) खाने वाले मनुष्य को लम्बे परिवार का पालन करना होता है और इसके लिए धन कमाना होता है, किन्तु उसे पेटभर खाने से अधिक कुछ नहीं मिलता और कभी-कभी तो उसे परिवार के जूठन पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अनुचित साधनों से भी धन कमा कर वह स्वयं जीवन का आनन्द नहीं उठा पाता। यही आवरणात्मिका माया है।

समाज, देश तथा समुदाय की भ्रामक सेवा की प्रक्रिया सर्वत्र एक सरीखी है। यही सिद्धान्त बड़े से बड़े राष्ट्रीय नेताओं पर भी लागू होता है। कभी-कभी ऐसा राष्ट्रीय नेता जिसकी देश-सेवाएँ महान् होती हैं अपने ही देशवासियों द्वारा मार दिया जाता है, क्योंकि उसकी सेवाएँ अनियमित होती हैं। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति अपने आश्रितों को इस मोहमयी सेवा से सन्तुष्ट नहीं कर सकता। यद्यपि वह इस सेवा से अलग नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी स्वाभाविक स्थिति ही सेवक की है। स्वाभाविक दृष्टि से जीव परमेश्वर का अंश है, किन्तु वह भूल जाता है कि उसे परम पुरुष की सेवा करनी है और वह अपना ध्यान अन्यों की सेवा की ओर मोड़ देता है। यह माया कहलाती है। अन्यों की सेवा करते हुए वह झूठे ही अपने को स्वामी मान बैठता है। परिवार का मुखिया अपने को परिवार का स्वामी मानता है अथवा राष्ट्र का नेता अपने को राष्ट्र का स्वामी मानता है, किन्तु वास्तव में वह माया की सेवा करता है और माया की सेवा करने से वह धीरे-धीरे नरक को जाता है। अत: बुद्धिमान मनुष्य को कृष्णभावनामृत के बिन्दु तक पहुँच कर भगवान् की सेवा में लग जाना चाहिए और अपना सारा जीवन, सारा धन, सारी बुद्धि तथा सारी बोलने की शक्ति उसी में लगा देनी चाहिए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥