श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
वार्तायां लुप्यमानायामारब्धायां पुन: पुन: ।
लोभाभिभूतो नि:सत्त्व: परार्थे कुरुते स्पृहाम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
वार्तायाम्—उसकी वृत्ति या जीविका के; लुप्यमानायाम्—अवरुद्ध होने पर; आरब्धायाम्—ग्रहण की जाती है; पुन: पुन:—बार-बार; लोभ—लालच से; अभिभूत:—अधीर; नि:सत्त्व:—विनष्ट; पर-अर्थे—अन्यों की सम्पत्ति के लिए; कुरुते स्पृहाम्—कामना करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब उसे अपनी जीविका में प्रतिकूल फल मिलते हैं, तो वह बारम्बार अपने को सुधारने का यत्न करता है, किन्तु जब उसके सारे प्रयास असफल रहते हैं और वह विनष्ट हो जाता है, तो अत्यन्त लोभवश वह अन्यों का धन स्वीकार करता है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥