श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 12

 
श्लोक
कुटुम्बभरणाकल्पो मन्दभाग्यो वृथोद्यम: ।
श्रिया विहीन: कृपणो ध्यायञ्‍छ्वसिति मूढधी: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
कुटुम्ब—अपना परिवार; भरण—पालन करने में; अकल्प:—असमर्थ; मन्द-भाग्य:—अभागा; वृथा—व्यर्थ ही; उद्यम:—जिसका प्रयास; श्रिया—सौंदर्य, धन; विहीन:—रहित; कृपण:—कंजूस; ध्यायन्—शोक करता हुआ; श्वसिति—आहें भरता है; मूढ—मोहग्रस्त; धी:—बुद्धि वाला ।.
 
अनुवाद
 
 जब वह अभागा अपने परिवार वालों के भरण-पोषण में असफल होकर समस्त सौन्दर्य से विहीन हो जाता है, तो वह सदैव लम्बी-लम्बी आहें भरता हुआ अपनी विफलता के विषय में सोचता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥