श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तथा ।
नाद्रियन्ते यथापूर्वं कीनाशा इव गोजरम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; स्व-भरण—उनको पालने में; अकल्पम्—असमर्थ; तत्—उसकी; कलत्र—पत्नी; आदय:— इत्यादि; तथा—उसी प्रकार; न—नहीं; आद्रियन्ते—आदर करते हैं; यथा—जिस तरह; पूर्वम्—पहले; कीनाशा:— किसान; इव—सदृश; गो-जरम्—पुराना बैल ।.
 
अनुवाद
 
 उसे अपने पालन-पोषण में असमर्थ देखकर उसकी पत्नी तथा अन्य लोग उसे उसी तरह पहले जैसा सम्मान नहीं प्रदान करते जिस तरह कंजूस किसान अपने बुढ़े तथा थके बैलों के साथ पहले जैसा व्यवहार नहीं करता।
 
तात्पर्य
 इसी युग में नहीं, अपितु अनादि काल से अपने परिवार में कोई भी ऐसे वृद्ध पुरुष को नहीं चाहता जो कमाता नहीं। यहाँ तक कि वर्तमान युग में कुछ जातियों अथवा राज्यों में बूढ़ों को विष दे दिया जाता है, जिससे वे जितनी जल्दी हो सके मर जाँय। कतिपय मानवभक्षी जातियों में बूढ़े बाबा को खेल-खेल में मारकर उसके माँस की दावत दी जाती है। यहाँ पर उस किसान का उदाहरण दिया गया है, जो अपने उस बूढ़े बैल को नहीं चाहता जिसने काम करने के लायक नहीं रह गया है। इसी प्रकार से परिवार से सम्बद्ध व्यक्ति जब वृद्ध हो जाता है और कमा नहीं सकता तो उसे न तो उसकी पत्नी, पुत्र, पुत्रियाँ चाहते हैं न ही परिजन। फलस्वरूप उसकी उपेक्षा होने लगती है, आदर करने की बात तो दूर रही। अत: यह लाभप्रद होगा कि वृद्धावस्था प्राप्त होने के पूर्व ही पारिवारिक सम्बन्ध तोड़ दिया जाय और भगवान् की शरण ग्रहण की जाय। मनुष्य को चाहिए कि अपने-आपको भगवान् की सेवा में लगा दे जिससे वे उसका भार अपने ऊपर ले सकें और इस तरह वह मनुष्य अपने स्वजनों से उपेक्षित न हो।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥