श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
आस्तेऽवमत्योपन्यस्तं गृहपाल इवाहरन् ।
आमयाव्यप्रदीप्ताग्निरल्पाहारोऽल्पचेष्टित: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
आस्ते—रहा आता है; अवमत्या—उपेक्षा भाव से; उपन्यस्तम्—जो दिया जाता है; गृह-पाल:—कुत्ता; इव—सदृश; आहरन्—खाते हुए; आमयावी—रुग्ण; अप्रदीप्त-अग्नि:—अजीर्ण, मन्दाग्न्यता; अल्प—थोड़ा; आहार:—भोजन; अल्प—थोड़ा; चेष्टित:—उसके कार्य ।.
 
अनुवाद
 
 वह घर पर पालतू कुत्ते की भाँति रह रहा होता है और उपेक्षाभाव से उसे जो भी दिया जाता है, उसे खाता है। अजीर्ण तथा मंदाग्नि जैसी अनेक प्रकार की व्याधियों से ग्रस्त होकर, वह केवल कुछ कौर भोजन करता है और अशक्त होने के कारण कोई भी काम नहीं कर पाता।
 
तात्पर्य
 मृत्यु के पूर्व मनुष्य को रुग्ण तथा असक्त होना पड़ता है और जब उसके परिवार के लोग उसकी उपेक्षा करते हैं, तो उसकी स्थिति एक कुत्ते से भी बदतर हो जाती है, क्योंकि उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अत: वैदिक शास्त्रों का आदेश है कि ऐसी दयनीय स्थिति प्राप्त होने के पूर्व मनुष्य घर त्याग दे और अपने परिवार की जानकारी से दूर मरे। यदि मनुष्य घर छोडक़र परिवार वालों की जानकारी के बिना मरता है, तो इसे महिमामय मृत्यु कहते हैं। किन्तु परिवार से आसक्त व्यक्ति चाहता है कि उसके मरने के बाद भी परिवार वाले उसे एक विशाल जुलूस (शवयात्रा) में ले जायँ, भले ही वह उसे देख न पाये। इस प्रकार यह जाने बिना कि जब वह अपना शरीर छोड़ता है, तो अगले जन्म में उसे कहाँ जाना होगा, वह प्रसन्न रहता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥