श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
एवं कुटुम्बभरणे व्यापृतात्माजितेन्द्रिय: ।
म्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधी: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; कुटुम्ब-भरणे—परिवार का पालन करने में; व्यापृत—तल्लीन; आत्मा—उसका मन; अजित— अनियन्त्रित; इन्द्रिय:—उसकी इन्द्रियाँ; म्रियते—मर जाता है; रुदताम्—रोते हुए; स्वानाम्—कुटुम्बियों को; उरु— महान्; वेदनया—पीड़ा से; अस्त—विहीन; धी:—चेतना ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार जो व्यक्ति इन्द्रियों को वश में किये बिना परिवार के भरण-पोषण में लगा रहता है, वह अपने रोते कुटुम्बियों को देखता हुआ अत्यन्त शोक में मरता है। वह अत्यन्त दयनीय अवस्था में, असह्य पीड़ा के साथ, किन्तु चेतना विहीन होकर मरता है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि मृत्यु के समय मनुष्य उन्हीं विचारों में निमग्न रहता है, जिसका उसने जीवन भर अनुशीलन किया है। जिस व्यक्ति ने जीवन भर अपने परिवार के भरण-पोषण के अतिरिक्त और कुछ न सोचा हो उसके अन्तिम विचारों में पारिवारिक बातें ही रहेंगी। सामान्य व्यक्ति के लिए यह स्वाभाविक स्थिति होती है। सामान्य व्यक्ति अपने भाग्य को नहीं जानता है, वह केवल परिवार का पालन-पोषण करता रहता है। अन्तिम अवस्था में किसी को सन्तोष नहीं होता कि उसने परिवार की आर्थिक दशा कैसे सुधारी, हर एक व्यक्ति यही सोचता है कि मैंने यथेष्ठ सेवा नहीं की। परिवार के प्रति प्रगाढ़ स्नेह के कारण वह अपनी इन्द्रियों को वश में करने तथा अपनी आध्यात्मिक चेतना सुधारने के मुख्य कर्तव्य को भूल जाता है। कभी-कभी मरने वाला व्यक्ति परिवार का भार अपने पुत्र या अन्य सम्बन्धी को सौंपते हुए कहता है, “मैं तो जा रहा हूँ, किन्तु तुम परिवार को देखना।” वह यह नहीं जानता कि कहाँ जा रहा है, किन्तु मृत्यु के समय भी वह चिन्तित रहता है कि उसके परिवार का निर्वाह किस तरह होगा। कभी कभी देखा जाता है कि मरने वाला व्यक्ति वैद्य से कुछ ही वर्षों तक आयु बढ़ाने की याचना करता है, जिससे वह परिवार-भरण के लिए प्रारम्भ की गई अपनी योजना पूरी कर सके। बद्धजीव की ये ही व्याधियाँ हैं। वह अपने वास्तविक कार्य—कृष्णभक्ति—को भूल जाता है और अपने परिवार के जीवन-निर्वाह की योजनाओं में ही लगा रहता है, यद्यपि वह एक-एक करके अपना परिवार बदलता रहता है।
 
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