श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
यातनादेह आवृत्य पाशैर्बद्ध्वा गले बलात् ।
नयतो दीर्घमध्वानं दण्ड्यं राजभटा यथा ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
यातना—दंड के लिए; देहे—उसका शरीर; आवृत्य—ढक कर; पाशै:—रस्सियों से; बद्ध्वा—बाँध कर; गले—गले से; बलात्—बलपूर्वक; नयत:—ले जाते हैं; दीर्घम्—लम्बी; अध्वानम्—दूरी; दण्ड्यम्—अपराधी; राज-भटा:— राजा के सिपाही; यथा—जिस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 जिस प्रकार राज्य के सिपाही अपराधी को दण्डित करने के लिए उसे गिरफ्तार करते हैं उसी प्रकार इन्द्रियतृप्ति में संलग्न अपराधी पुरुष यमदूतों के द्वारा बन्दी बनाया जाता है। वे उसे मजबूत रस्सी से गले से बाँध लेते हैं और उसके सूक्ष्म शरीर को ढक देते हैं जिससे उसे कठोर से कठोर दण्ड दिया जा सके।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक जीव सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर से ढका रहता है। सूक्ष्म शरीर मन, अहंकार, बुद्धि तथा चेतना का आवरण है। शास्त्रों का कथन है कि यमराज के सिपाही अपराधी के सूक्ष्म शरीर को ढक कर उसे यमराज के आवास में ले जाते हैं जहाँ उसे इस तरह दण्ड दिया जाता है, जिसे वह सह ले। वह इस दण्ड से मरता नहीं, क्योंकि यदि मर जाय तो फिर दण्ड कौन सहेगा? यमराज के सिपाहियों का काम किसी को मारना नहीं है। वस्तुत: किसी जीव को मारना सम्भव नहीं, क्योंकि वास्तव में वह नित्य है; उसे केवल इन्द्रियतृप्ति के कार्यों का फल भुगतना पड़ता है।

चैतन्य-चरितामृत में दण्ड की विधि वर्णित है। पहले राजा के आदमी उस अपराधी को नौका द्वारा नदी के बीच तक ले जाते हैं। वे उसके बाल पकडक़र उसे पानी में डुबोते हैं और जब उसका दम घुटने लगता है, तो राजा के सिपाही उसे पानी से निकाल कर कुछ समय तक साँस लेने देते हैं और फिर बार-बार उसी तरह से पानी में डुबोते और निकालते हैं। इसी प्रकार का दण्ड यमराज द्वारा विस्मृत जीवों को दिया जाता है, जिसका वर्णन अगले श्लोकों में हुआ है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥