श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
आदीपनं स्वगात्राणां वेष्टयित्वोल्मुकादिभि: ।
आत्ममांसादनं क्‍वापि स्वकृत्तं परतोऽपि वा ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
आदीपनम्—अग्नि लगाकर; स्व-गात्राणाम्—अपने अंगों को; वेष्टयित्वा—लपेट कर; उल्मुक-आदिभि:—जलती लकड़ी के टुकड़ों आदि से; आत्म-मांस—अपने मांस का; अदनम्—भोजन करते; क्व अपि—कभी-कभी; स्व- कृत्तम्—अपने द्वारा किया गया; परत:—अन्यों द्वारा; अपि—भी; वा—अथवा ।.
 
अनुवाद
 
 वहाँ उसे जलती लकडिय़ों के बीच में रख दिया जाता है और उसके अंगों में आग लगा दी जाती है। कभी-कभी उसे अपना मांस स्वयं खाने के लिए बाध्य किया जाता है अथवा अन्यों द्वारा खाने दिया जाता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में तथा अगले तीन श्लोकों में यातनाओं का वर्णन हुआ है। पहला विवरण यह है कि अपराधी को स्वयं आग में पका अपना मांस खाना पड़ता है या अन्य जो वहाँ उपस्थित होते हैं उन्हें खाने देना पड़ता है। पिछले महायुद्ध में, लोगों को यातना-शिविरों में अपना मल खाना पड़ा था, अत: इसमें कोई आश्चर्य नहीं यदि यमराज के निवास ‘यमसादन’ में अपराधी को, जो कभी दूसरे का मांस खाता है, अपना ही मांस खाना पड़ता हो।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥