श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
यदध्रुवस्य देहस्य सानुबन्धस्य दुर्मति: ।
ध्रुवाणि मन्यते मोहाद् गृहक्षेत्रवसूनि च ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—क्योंकि; अध्रुवस्य—क्षणिक; देहस्य—शरीर का; स-अनुबन्धस्य—सम्बन्धियों से; दुर्मति:—पथभ्रष्ट व्यक्ति; ध्रुवाणि—स्थायी; मन्यते—सोचता है; मोहात्—अज्ञानवश; गृह—घर; क्षेत्र—जमीन; वसूनि—सम्पत्ति; च—तथा ।.
 
अनुवाद
 
 विभ्रमित भौतिकतावादी व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसका अपना यह शरीर अस्थायी है और घर, जमीन तथा सम्पत्ति जो इस शरीर से सम्बन्धित हैं, ये सारे आकर्षण भी क्षणिक हैं। वह अपने अज्ञान के कारण ही हर वस्तु को स्थायी मानता है।
 
तात्पर्य
 भौतिकतावादी सोचता है कि कृष्णभावनामृत में अनुरक्त व्यक्ति सनकी होते हैं, जो हरे कृष्ण कीर्तन में अपना समय गँवाते हैं, किन्तु यह नहीं सोचता है कि स्वयं पागलपन के गहन अंधकार में है, क्योंकि वह अपने शरीर को स्थायी मान बैठता है। अपने शरीर के साथ ही वह अपने घर, देश, समाज तथा अन्य साज-सज्जा को स्थायी मान लेता है। घर, जमीन आदि को स्थायी मान बैठना माया-मोह कहलाता है। यहाँ पर इसका स्पष्ट उल्लेख हुआ है। मोहाद् गृह-क्षेत्र-वसूनि—मोहवश ही भौतिकतावादी अपने घर, अपनी भूमि तथा अपने धन को स्थायी मानते हैं। इसी मोह से पारिवारिक जीवन, राष्ट्रीय जीवन तथा आर्थिक विकास की वृद्धि हुई है, क्योंकि आधुनिक सभ्यता में ये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कारक हैं। किन्तु एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति यह जानता है कि मानव समाज की आर्थिक उन्नति केवल क्षणिक मोह है।

श्रीमद्भागवत में अन्यत्र शरीर को स्व मानना, इस शरीर के साथ सम्बन्धित अन्यों को अपना परिजन मानना तथा अपनी जन्मभूमि को पूज्य मानना आदि, पाशविक सभ्यता की उपज घोषित किया गया है। किन्तु कृष्णभक्त हो जाने पर मनुष्य इन सबका उपयोग भगवान् की सेवा करने में कर सकता है। यह अत्यन्त उपयुक्त योजना है। हर वस्तु कृष्ण से सम्बन्धित है। जब समस्त आर्थिक विकास तथा भौतिक उन्नति का उपयोग कृष्णभक्ति को अग्रसर करने में किया जाता है, तो प्रगतिशील जीवन की एक नवीन अवस्था उदित होती है।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥