श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
दैवेनासादितं तस्य शमलं निरये पुमान् ।
भुङ्क्ते कुटुम्बपोषस्य हृतवित्त इवातुर: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
दैवेन—भगवान् की व्यवस्था से; आसादितम्—प्राप्त; तस्य—उसका; शमलम्—पापपूर्ण फल, कुफल; निरये— नारकीय अवस्था में; पुमान्—मनुष्य; भुङ्क्ते—भोगता है; कुटुम्ब-पोषस्य—परिवार के पोषण का; हृत-वित्त:— जिसकी सम्पत्ति लुट गई हो; इव—सदृश; आतुर:—व्याकुल ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार भगवान् की व्यवस्था से, परिवार का पोषणकर्ता अपने पापकर्मों को भोगने के लिए नारकीय अवस्था में रखा जाता है मानो उसकी सारी सम्पत्ति लुट गई हो।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर उदाहरण दिया गया है कि पापी मनुष्य को वैसे ही कष्ट होता है, जिस प्रकार मनुष्य की सम्पत्ति लुटने पर होता है। बद्धजीव को अनेक जन्मों के बाद मनुष्य का शरीर प्राप्त होता है और यह एक अमूल्य निधि है। किन्तु यदि कोई मुक्ति प्राप्त करने के लिए इस जीवन का उपयोग नहीं करता वरन् अपने तथाकथित परिवार के पालन-पोषण में ही लगाता है और इस तरह मूर्खतापूर्ण तथा अवैध कर्म करता रहता है, तो वह उस पुरुष के समान है, जो अपनी सारी सम्पत्ति लुट चुकने पर शोक करता है। सम्पत्ति लुट जाने पर शोक करने से क्या लाभ? किन्तु जब तक पास में सम्पत्ति रहे तब तक उसका समुचित उपयोग करके शाश्वत लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ यह तर्क किया जा सकता है कि जब मनुष्य पापकर्म के द्वारा अर्जित धन को छोड़ कर मर जाता है, तो अपने धन के साथ अपने पापकर्म भी छोड़ जाता है। किन्तु यहाँ यह विशेष उल्लेख है कि दैवी व्यवस्था (दैवेनासादितम्) से यद्यपि वह अपना धन छोड़े जाता है, किन्तु इसके प्रभाव को अपने साथ लेता जाता है। यदि कोई कुछ धन चुरावे और पकड़ा जाय तथा उस धन को राज्य के कानून के अनुसार भले ही वह लौटा दे, किन्तु उसे दण्ड भोगना ही पड़ता है। इसी प्रकार अपराध द्वारा अर्जित धन मरते समय भले ही यहाँ छूट जाय, किन्तु दैवी व्यवस्था के अनुसार इसके फल को अपने साथ लेता जाता है, अत: उसे नारकीय जीवन भोगना पड़ता है।
 
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