श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
अधस्तान्नरलोकस्य यावतीर्यातनादय: ।
क्रमश: समनुक्रम्य पुनरत्राव्रजेच्छुचि: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
अधस्तात्—नीचे से; नर-लोकस्य—मनुष्य जन्म; यावती:—जितनी; यातना—दण्ड, सजाएँ; आदय:—इत्यादि; क्रमश:—नियत क्रम; समनुक्रम्य—से होकर जाने पर; पुन:—फिर; अत्र—यहाँ, इस पृथ्वी पर; आव्रजेत्—लौट सकता है; शुचि:—शुद्ध ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त कष्टकर नारकीय परिस्थितियों से तथा मनुष्य जन्म के पूर्व पशु-जीवन के निम्नतम रूपों को क्रमश: पार करते हुए और इस प्रकार अपने पापों को भोगते हुए, वह इस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में पुन: जन्म लेता है।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार से एक बन्दी को बन्दीगृह का कष्टमय जीवन बिताने के बाद पुन: मुक्त कर दिया जाता है उसी तरह जो व्यक्ति पहले अपवित्र तथा शरारतपूर्ण कर्म कर चुका होता है, वह नारकीय स्थितियों में रखा जाता है और विभिन्न प्रकार के नारकीय जीवन—यथा कुत्ते, बिल्ली तथा शूकर जैसे निम्न पशुओं के जीवन बिताने के बाद क्रमश: विकास क्रिया के द्वारा पुन: मनुष्य रूप में आता है। भगवद्गीता में कहा गया है कि योगाभ्यास में लगा व्यक्ति कभी-कभी अच्छी तरह से उसे पूरा नहीं कर पाता और वह किसी न किसी कारण से नीचे गिर जाता है, किन्तु तो भी अगले जीवन में उसका मनुष्य होना निश्चित है। यह कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति जो योग के पथ से च्युत होता है उसे किसी अत्यन्त धनी परिवार में या अत्यन्त पवित्र कुल में जन्म लेने का अवसर प्रदान किया जाता है। इससे यह अर्थ लगाया जाता है कि धनी परिवार किसी बड़े व्यापारी कुल का सूचक है, क्योंकि जो लोग व्यापार करते हैं, वे अत्यन्त धनी होते हैं। जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार में या परमेश्वर के साथ सम्बन्ध स्थापित करने (योग) में लगा रहता है, किन्तु उसे पूरा नहीं कर पाता तो उसे धनी परिवार में या कि पवित्र ब्राह्मण-कुल में जन्म लेने दिया जाता है। दोनों ही तरह से उसे अगले जीवन में मनुष्य समाज में जन्म लेने की गांरटी रहती है। अत: यह निष्कर्ष निकला कि जो तामिस्र या अंधतामिस्र जैसे नरक का जीवन बिताना नहीं चाहता उसे कृष्णभक्ति की विधि अपनानी चाहिए, जो प्रथमकोटि की योगपद्धति है, क्योंकि यदि कोई उससे इस जीवन में पूर्ण कृष्णभावनामृत प्राप्त नहीं कर पाता तो अगले जन्म में मनुष्य परिवार में उसका जन्म निश्चित है। उसे नरक नहीं भेजा जा सकता। कृष्णभावनाभावित होना शुद्धतम जीवन है। यह सभी मनुष्यों को नरक की ओर जाकर कुत्तों या शूकरों के परिवार में जन्म लेकर नरक की ओर जाने से बचाती है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध के अन्तर्गत “भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन” नामक तीसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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